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संपादकीयः सच का साथ

कुलभूषण जाधव से पहले भी अनेक मामलों में पाकिस्तानी सैन्य अदालत कई भारतीय नागरिकों को जासूसी और आतंकवादी गतिविधियों में शामिल बता कर दंड सुना चुकी है।

KULBHUSHAN JADHAVकुलभूषण जाधव (फाइल फोटो)

पाकिस्तान की जेल में बंद कुलभूषण जाधव के मामले में आखिरकार अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने भारतीय पक्ष को सही करार देते हुए पाकिस्तान को जाधव के मामले में फिर से विचार करने को कहा है। निस्संदेह यह भारत की एक बड़ी कामयाबी है। कुलभूषण जाधव को पाकिस्तानी खुफिया एजंसी ने जासूसी और आतंकवादी घटनाओं में लिप्त रहने के आरोप में गिरफ्तार किया था। पाकिस्तानी सैन्य अदालत में उन पर मुकदमा चला और उसने खुफिया एजंसी के आरोपों को सही ठहराते हुए जाधव को फांसी की सजा सुना दी। भारत ने बहुत प्रयास किया कि इस मामले में उसका भी पक्ष सुना जाए, जाधव को कानूनी सलाहकार उपलब्ध कराया जाए और इस प्रकरण में भारतीय राजनयिक से जाधव की मुलाकात कराई जाए। मगर पाकिस्तान ने इन मांगों को ठुकरा दिया। जबकि वियना संधि के अनुसार ऐसे मामलों में दूसरे देशों के बंदियों को उनके देश के राजनयिकों से मुलाकात और कानूनी सलाह की सुविधा उपलब्ध कराना अनिवार्य है। इस पर भारत ने अंतरराष्ट्रीय अदालत में गुहार लगाई कि पाकिस्तानी सैन्य अदालत ने पक्षपातपूर्ण तरीके से जाधव को फांसी की सजा सुनाई है। पाकिस्तान ने अपने पक्ष में दलीलें रखीं, पर अंतरराष्ट्रीय अदालत ने उसकी सारी दलीलों को खारिज कर दिया। इस तरह सोलह में से पंद्रह न्यायाधीशों ने भारत के पक्ष को सही माना।

कुलभूषण जाधव से पहले भी अनेक मामलों में पाकिस्तानी सैन्य अदालत कई भारतीय नागरिकों को जासूसी और आतंकवादी गतिविधियों में शामिल बता कर दंड सुना चुकी है। इस तरह पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कहता रहा है कि भारत उसकी सीमा में अस्थिरता फैलाने वाली गतिविधियां संचालित करता है। जब भी भारत, पाकिस्तान पर आतंकी गतिविधियों को बढ़ावा देने का आरोप लगाता रहा है, पाकिस्तान उन मामलों के जरिए साबित करने की कोशिश करता रहा है कि दरअसल, भारत खुद ऐसी गतिविधियां उसके विरुद्ध संचालित करता है। ऐसे ही आरोप में सरबजीत सिंह को भी फांसी की सजा सुनाई गई थी। पंजाब के सीमावर्ती गांवों से कई बार लोग गफलत में पाकिस्तान सीमा में प्रवेश कर जाते हैं और जब वहां के सुरक्षाबलों की गिरफ्त में आते हैं, तो वे उन्हें भी ऐसे ही आरोपों में फंसा देते हैं। कुलभूषण जाधव मामले में अंतरराष्ट्रीय अदालत के फैसले से पाकिस्तान के झूठ पर से परदा उठ गया है। यह भी साबित हुआ कि वहां की सैन्य अदालतें किस तरह दुर्भावनापूर्ण और मनमाने तरीके से काम करती हैं। उन्हें अंतरराष्ट्रीय कानूनों तक की परवाह नहीं है।
छिपी बात नहीं है कि पाकिस्तान अपने यहां चल रहे आतंकवादी प्रशिक्षण शिविरों और वहां पनाह पाए आतंकी सरगना की करतूतों पर परदा डालने की गरज से उल्टा भारत के खिलाफ ऐसे सबूत जुटाने का प्रयास करता रहा है, जिनसे अंतरराष्ट्रीय बिरादरी के सामने साबित कर सके कि आतंकवाद के मामले में असल दोषी भारत है। इसी मंशा से वह आतंकवादी घटनाओं से जुड़े भारत की तरफ से पेश सबूतों को लगातार खारिज करता रहा है। कुलभूषण जाधव मामले में एक बार फिर उसकी कलई खुली है। निस्संदेह इसमें भारतीय राजनयिक प्रयास भी सराहनीय रहे। सरबजीत मामले में जो कमजोरियां रह गई थीं, उनसे सबक लेते हुए भारत ने हर तरह से अपने सबूत और तर्क पुख्ता रखे। इस मामले में अंतरराष्ट्रीय फैसला इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है कि इससे आतंकवाद से निपटने के मामले में पाकिस्तान के झूठ पर से परदा उठाने में भी मदद मिलेगी और पाकिस्तान शायद भारत के खिलाफ ऐसे फर्जी मामले जुटाने से भी हिचके।

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