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संपादकीयः सूचना पर लगाम

मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्तों के खिलाफ मिलने वाली शिकायतों की जांच, कार्रवाई और निपटान के लिए केंद्र सरकार ने जो रास्ता अख्तियार किया है वह चौंकाने वाला है।

Author Published on: April 4, 2019 3:41 AM
हाल में सरकार ने इस दिशा में जो कदम बढ़ाया है वह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि आरटीआइ यानी सूचना के अधिकार के लिए काम करने वालों सहित देश के किसी भी नागरिक को मांगी गई सूचना मुहैया कराने वाली इस संस्था पर सरकार अब लगाम कसना चाहती है।

मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्तों के खिलाफ मिलने वाली शिकायतों की जांच, कार्रवाई और निपटान के लिए केंद्र सरकार ने जो रास्ता अख्तियार किया है वह चौंकाने वाला है। हाल में सरकार ने इस दिशा में जो कदम बढ़ाया है वह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि आरटीआइ यानी सूचना के अधिकार के लिए काम करने वालों सहित देश के किसी भी नागरिक को मांगी गई सूचना मुहैया कराने वाली इस संस्था पर सरकार अब लगाम कसना चाहती है। इसलिए अब मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्तों के खिलाफ मिलने वाली शिकायतों की जांच के लिए दो समितियां बनाने का प्रस्ताव केंद्रीय सूचना आयोग को भेजा गया है। इस प्रस्ताव के तहत यह व्यवस्था की गई है कि एक समिति मुख्य सूचना आयुक्त से जुड़ी शिकायतों को देखेगी और दूसरी सूचना आयुक्तों के खिलाफ मिली शिकायतों को। मुख्य सूचना आयुक्त के खिलाफ जांच के लिए जो समिति बनाने की बात है उसमें कैबिनेट सचिव, कार्मिक और प्रशिक्षण मंत्रालय के सचिव, एक पूर्व मुख्य सूचना आयुक्त शामिल होंगे। इसी तरह की सरकार के शीर्ष नौकरशाहों की दूसरी समिति सूचना आयुक्तों के खिलाफ शिकायतों के बारे में फैसले करेगी।

सरकार के इस कदम से आयोग खफा है। जाहिर है, ऐसा कोई भी कदम आयोग की स्वतंत्रता पर हमला होगा। दोनों ही समितियों का प्रारूप यह बताता है कि इस स्वतंत्र और निष्पक्ष संस्था पर सरकार हावी होने की तैयारी में है। अभी तक व्यवस्था यह है कि मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्तों के खिलाफ जो शिकायतें आती हैं उनका निपटारा आयोग की बैठक में ही होता है। तब सवाल है कि सरकार को क्या यह प्रक्रिया पारदर्शी नहीं लगती! आखिर क्यों उसे नई व्यवस्था लाने की जरूरत महसूस हो रही है? ऐसा भी नहीं कि सर्वोच्च अदालत से इस बारे में कोई दिशानिर्देश दिया गया हो। सर्वोच्च अदालत ने तो एक बार पूछा भर था कि मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्त से संबंधित शिकायतों को निपटाने की प्रक्रिया क्या है। लेकिन सरकार ने इसकी आड़ में ऐसा कदम उठाया है जो सीधे तौर पर इस संस्था को कमजोर करने के संकेत देता है। पिछले कुछ समय में जिस तरह की जानकारियां और सूचनाएं आयोग से मांगी से गई हैं और आयोग ने इन सूचनाओं को मुहैया कराने के लिए निर्धारित प्रक्रिया के तहत काम किया, उससे लगता है कहीं न कहीं सरकार घबराई हुई है। आइटीआइ के तहत सरकार के मंत्रियों, अफसरों और महत्त्वपूर्ण योजनाओं के बारे में जानकारियां मांगने वाले आरटीआइ कार्यकर्ताओं की सजगता और सक्रियता की वजह से सरकार को कई बार असहज स्थितियों का सामना करना पड़ा है।

दरअसल, पिछले साल केंद्रीय सूचना आयोग ने एक अधिकारी की अपील पर फैसला सुनाते हुए पीएमओ यानी प्रधानमंत्री कार्यालय को निर्देश दिया था कि 2014 से 2017 के बीच केंद्रीय मंत्रियों के खिलाफ भ्रष्टाचार की जो शिकायतें आई हैं उनका खुलासा किया जाए। पीएमओ को कालेधन से संबंधित मांगी गई जानकारी भी देने कहा गया था। लेकिन पीएमओ ने जवाब में यह कह दिया कि जो जानकारियां मांगी गई हैं, वे सूचना की परिभाषा के दायरे में नहीं आती हैं। लेकिन इस जवाब को मुख्य सूचना आयुक्त ने खारिज कर दिया। आरटीआइ ही एक ऐसा हथियार है जो आम लोगों का सशक्तिकरण और सरकार के कामकाज पर निगरानी को सुनिश्चित करता है और सरकार को जवाबदेह बनाता है। पिछले कुछ सालों में सीबीआइ, रिजर्व बैंक जैसी प्रमुख संस्थाओं के अधिकार क्षेत्र में सरकार के बढ़ते दखल के जैसे मामले सामने आए हैं, उसी की अगली कड़ी सीआइसी के रूप में सामने आ रही है। अगर सीआइसी जैसी संस्था कमजोर हुई तो सरकार की पारदर्शिता और जवाबदेही का क्या होगा!

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