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संपादकीयः अभाव की चिकित्सा

किसी भी देश में विकास की कसौटी यह होगी कि वह शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के मामले में कहां खड़ा है। जहां तक हमारे देश का सवाल है, हम इन तीनों ही क्षेत्रों में अभी बहुत अच्छी स्थिति में होने का दावा नहीं कर सकते।

Author April 16, 2019 2:34 AM
यों कहने को सरकारों ने अलग-अलग नामों से स्वास्थ्य के क्षेत्र में सुधार के लिए कई तरह की योजनाएं लागू की हैं। लेकिन अगर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों से लेकर जिला अस्पतालों तक में जरूरत के वक्त डॉक्टर या नर्स नहीं उपलब्ध होते हैं तो उन योजनाओं का हासिल क्या होगा?

किसी भी देश में विकास की कसौटी यह होगी कि वह शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के मामले में कहां खड़ा है। जहां तक हमारे देश का सवाल है, हम इन तीनों ही क्षेत्रों में अभी बहुत अच्छी स्थिति में होने का दावा नहीं कर सकते। खासतौर पर स्वास्थ्य के क्षेत्र में जो हालत है, उसमें यह कहना मुश्किल है कि देश में बेहतर गुणवत्ता की चिकित्सा सुविधाएं सबके लिए आसानी से उपलब्ध हैं। अगर ताजा तस्वीर यह है कि देश अभी डॉक्टरों और नर्सों की भारी कमी की समस्या से जूझ रहा है, तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि यहां की ज्यादातर आबादी सेहत के सामने खड़े किस तरह के संकट का सामना कर रही है। गौरतलब है कि सीडीडीईपी यानी अमेरिका के सेंटर फॉर डिजीज डाइनामिक्स, इकोनॉमिक्स एंड पॉलिसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में मौजूदा समय में छह लाख डॉक्टरों और बीस लाख से ज्यादा नर्सों की कमी है। इस आंकड़े के हिसाब से देखें तो यहां हर दस हजार एक सौ नवासी लोगों पर एक सरकारी डॉक्टर है, जबकि चार सौ तिरासी लोगों पर एक नर्स है। जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों के मुताबिक प्रति एक हजार लोगों पर एक डॉक्टर होना चाहिए। सवाल है कि एक स्तरीय वैश्विक पैमाने और भारत की हकीकत में इतना बड़ा फासला क्यों बना हुआ है?

हालांकि चिकित्सकों की भारी कमी के आंकड़े कोई पहली बार सामने नहीं आए हैं, लेकिन शायद इसे कभी गंभीरता से नहीं लिया जाता। यह बेवजह नहीं है कि देश की ज्यादातर आबादी अच्छी चिकित्सा के अभाव से दो-चार है और अपनी आय का एक बड़ा हिस्सा लोगों को अपने इलाज पर खर्च करना पड़ता है। इस समस्या का एक पहलू यह भी है कि देश के बहुत सारे अस्पतालों और सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों पर नियुक्ति के बावजूद जरूरतमंद लोगों को उनकी सेवाएं नहीं मिल पाती हैं। ऐसे डॉक्टरों की तादाद बहुत बड़ी है जो किसी अस्पताल या स्वास्थ्य केंद्र पर अपनी ड्यूटी पर मौजूद रहना तो जरूरी नहीं समझते, लेकिन उनकी निजी प्रैक्टिस में कोई बाधा नहीं आती। इस स्थिति की मार दूरदराज के इलाकों में लोगों को झेलनी पड़ती है, जहां अव्वल तो स्वास्थ्य केंद्र या अस्पताल नहीं हैं या फिर जो हैं, वहां भी नियुक्त डॉक्टर आमतौर पर उपलब्ध नहीं होते। ऐसे में ग्रामीण या फिर शहरी इलाकों में भी लोगों को मजबूरन बिना किसी चिकित्सा डिग्री वाले झोलाछाप डॉक्टरों का सहारा लेना पड़ता है। फिर कभी अच्छे इलाज से ठीक हो जाने वाले मरीजों की जान चली जाती है तो कभी साधारण बीमारी भी गंभीर रोग में तब्दील हो जाती है।

यों कहने को सरकारों ने अलग-अलग नामों से स्वास्थ्य के क्षेत्र में सुधार के लिए कई तरह की योजनाएं लागू की हैं। लेकिन अगर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों से लेकर जिला अस्पतालों तक में जरूरत के वक्त डॉक्टर या नर्स नहीं उपलब्ध होते हैं तो उन योजनाओं का हासिल क्या होगा? इस सबका सीधा असर यह हुआ है कि सार्वजनिक चिकित्सा तंत्र का ढांचा कमजोर पड़ता गया है और इसके बरक्स निजी अस्पतालों का एक बड़ा संजाल खड़ा हो चुका है। एक ओर बुनियादी सुविधाओं तक के अभाव से जूझते सरकारी अस्पताल और स्वास्थ्य केंद्र हैं और दूसरी ओर पांच सितारा सुविधाओं वाले निजी अस्पतालों की खड़ी होती शृंखला। यह किसी से छिपा नहीं है कि निजी अस्पतालों या क्लीनिकों में ऊंचे खर्च की वजह से साधारण लोगों के लिए वहां इलाज कराना संभव नहीं होता। ऐसे में डॉक्टरों और नर्सों की कमी आम आबादी के लिए दोहरी मार साबित होती है। सेहत की कसौटी पर इस अफसोसजनक स्थिति के रहते विकास का कोई भी दावा अधूरा ही कहा जाएगा।

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