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संपादकीयः कचरे की जगह

पिछले कुछ समय से एनसीआर यानी राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र किस कदर वायु प्रदूषण से जूझ रहा है, यह किसी से छिपा नहीं है।
Author December 7, 2017 02:33 am
(Express Photo/Praveen Khanna)

पिछले कुछ समय से एनसीआर यानी राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र किस कदर वायु प्रदूषण से जूझ रहा है, यह किसी से छिपा नहीं है। इसके बावजूद दिल्ली या इससे सटे राज्यों की सरकारों को इस समस्या की गंभीरता को समझना जरूरी नहीं लग रहा है। एक बड़ी समस्या यह है कि इन तमाम इलाकों में सभी लोग प्रदूषण की वजह से परेशान हैं, इसके लिए जताई जाने वाली चिंताओं में शामिल हैं, लेकिन अपने स्तर पर उससे निपटने के उपाय करने के बजाय उलटे आबो-हवा को बिगाड़ने में ही अपना योगदान कर रहे हैं। यह बेवजह नहीं है कि उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के नोएडा कार्यालय ने शहर में खाली भूखंडों पर कूड़ा जलाने और कचरा फेंकने को लेकर सख्त नाराजगी जताई है। गौरतलब है कि दिल्ली और आसपास के इलाकों में प्रदूषण की गहराती समस्या के बीच नोएडा में सदरपुर और छलेरा गांव के पास खाली भूखंड पर कचरा फेंकने और जलाने की शिकायतें सामने आई थीं।

उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की नाराजगी स्थानीय महत्त्व की लग सकती है। लेकिन फिलहाल समूचे एनसीआर का वातावरण लोगों की सांस और सेहत के सामने एक चुनौती की तरह खड़ा है और इसमें हवा में घुले धुएं की सबसे बड़ी भूमिका है। हाल में एनसीआर में ‘स्मॉग’ के लिए पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने को मुख्य वजह बताया गया था। लेकिन सच यह है कि खुद दिल्ली और आसपास के शहरों में वाहनों से निकलने वाले धुएं के अलावा कचरा फेंके और जलाए जाने में बरती जाने वाली घोर लापरवाही यहां के प्रदूषण के लिए कम जिम्मेदार नहीं है। स्थानीय मुहल्लों में तो लोग कचरा फेंकने और जलाने में घोर लापरवाही बरतते ही हैं, यहां तक कि कचरा निपटान स्थलों पर किसी वजह से लगी आग को बुझाने के प्रति संबंधित महकमा समय पर सक्रिय नहीं होता। कई जगहों पर इस तरह कूड़े के संयंत्रों तक पहुंचा कर सही निपटान के बजाय जला कर खत्म करने की कोशिश की जाती है और उनसे निकला धुआं समूची आबोहवा को दूषित और जहरीला बना देता है। हैरानी की बात यह भी है कि देश की राजधानी होने के बावजूद दिल्ली में भी अब तक कचरा प्रबंधन के लिए इस स्तर का इंतजाम नहीं किया जा सका है, जिसमें शत-प्रतिशत कचरा जमा करके उसका पुनर्चक्रण किया जाए और इससे होने वाले प्रदूषण से शहर को बचाया जा सके।

यह स्थिति अकेले दिल्ली की नहीं है। देश के अमूमन सभी शहरों में सड़कों पर जहां-तहां कूड़ा फेंकने या जलाने और उससे होने वाले प्रदूषण की समस्या मौजूद है। नतीजा यह है कि सड़ते हुए कचरे के ढेर से निकलने वाली रासायनिक गैसों से न केवल पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंच रहा है, बल्कि गंभीर बीमारियों का भी खतरा बढ़ रहा है। जहां तक दिल्ली का सवाल है, हाल ही में यहां धुंध और धुएं से मिल कर बनी ‘स्मॉग’ की समस्या की वजह से हालत यह हो गई कि लोगों के लिए सहजता से सांस तक लेना मुश्किल हो गया। उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने प्राधिकरण को भूखंडों से कचरा हटवाने और पानी का छिड़काव करने को कहा है। जाहिर है, यह प्रदूषण से निपटने का तात्कालिक उपाय है। लेकिन इस समस्या पर काबू पाने के लिए कचरा जमा करने और उसके उचित निपटान के लिए एक ठोस और सक्रिय तंत्र के साथ-साथ लोगों को भी जागरूक करने की जरूरत है।

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