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संपादकीयः तब और अब

तीन तलाक प्रथा या ‘तलाक-ए बिद्दत’ के खिलाफ आए विधेयक यानी मुसलिम महिला विवाह अधिकार संरक्षण विधेयक पर राजनीतिक दलों के बीच पिछले दिनों जो आम सहमति दिखी थी, अब उसमें दरार साफ दिख रही है।
Author January 5, 2018 03:25 am
इस तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

तीन तलाक प्रथा या ‘तलाक-ए बिद्दत’ के खिलाफ आए विधेयक यानी मुसलिम महिला विवाह अधिकार संरक्षण विधेयक पर राजनीतिक दलों के बीच पिछले दिनों जो आम सहमति दिखी थी, अब उसमें दरार साफ दिख रही है। इस विधेयक को लोकसभा पारित कर चुकी है। लोकसभा में इसे सत्तापक्ष के साथ ही लगभग पूरे विपक्ष का भी साथ मिला था। इसी आधार पर यह संभावना जताई जा रही थी कि राज्यसभा में भी यह विधेयक आसानी से पारित हो जाएगा। लेकिन इससे उलट, गुरुवार को विधेयक पर गतिरोध ही नजर आया। विपक्ष इसे प्रवर समिति को भेजने की मांग पर अड़ा रहा। जबकि सरकार इसे पारित कराने की नाकाम कवायद करती रही। राज्यसभा में सत्तापक्ष का बहुमत नहीं है। लिहाजा, विपक्ष की सहमति न होने से विधेयक फिलहाल लटक गया है। यह भी अभी साफ नहीं है कि विधेयक को प्रवर समिति को सौंपने की विपक्ष की मांग पर सरकार का रुख अंतत: क्या होगा। लेकिन गतिरोध के संदर्भ में जो बात सबसे गौरतलब है वह विपक्ष के रुख में कुछ दिन पहले और अब के बीच आया फर्क है। जब विधेयक लोकसभा में आया तो कांग्रेस समेत लगभग सारे विपक्ष ने उसका समर्थन किया था। लेकिन अब क्यों विपक्ष अड़ंगा लगा रहा है?

यह सही है कि लोकसभा में राजग का खासा बहुमत है, इसलिए विपक्ष वहां विधेयक को पारित होने से नहीं रोक सकता था। पर वहां समर्थन करने और अब विधेयक को प्रवर समिति को सौंपने के लिए अड़ जाने का क्या औचित्य है? अगर विधेयक दोषपूर्ण है, तो विपक्ष लोकसभा में उस पर जोरदार बहस तो कर ही सकता था। लेकिन लोकसभा में विपक्ष की नरमी का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि विपक्षी सांसदों ने जो संशोधन पेश किए उनमें से किसी पर भी मत-विभाजन की मांग नहीं की। जबकि राज्यसभा में बुधवार को विपक्ष अपनी पूरी तैयारी से और पूरे संख्याबल के साथ मौजूद था और सदन में विपक्ष के नेता गुलाम नबी आजाद ने सभापति से कहा कि वे चाहें तो विधेयक प्रवर समिति को सौंपने की मांग पर मत-विभाजन करा लें। ऐसा कराना सत्तापक्ष के लिए खतरे से खाली नहीं होता, क्योंकि बीजू जनता दल, अन्नाद्रमुक और तेलुगू देशम जैसी पार्टियां भी विधेयक को मौजूदा स्वरूप में पारित कराने के पक्ष में नहीं हैं। अगर प्रवर समिति के मसले पर मत-विभाजन होता, तो सत्तापक्ष की किरकिरी भी हो सकती थी। दूसरी तरफ, इसमें विपक्ष की एक राजनीतिक जीत नजर आती। लेकिन अगर विपक्ष की मांग नहीं मानी जाती है, तो हो सकता है यह विधेयक इस सत्र में पारित न हो पाए। इसका अर्थ होगा कि बजट सत्र में भी इस पर रस्साकशी होगी। क्या सरकार की इसमें दिलचस्पी है, क्या सत्तापक्ष को इसमें कोई लाभ दिख रहा है?

उत्तर प्रदेश के चुनाव से लेकर अब तक भाजपा जिस तरह से लगातार तीन तलाक के मुद्दे को जोर-शोर से उठाती रही है, उससे उसकी दिलचस्पी जाहिर है। एक तरफ वह मुसलिम महिलाओं की हितैषी दिखना चाहती है और दूसरी तरफ, अपने को धर्मनिरपेक्ष कहने वाले दलों को सांसत में रखना चाहती है। विधेयक के मौजूदा स्वरूप का विरोध अगर कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस जैसी पार्टियों तक सीमित रहता, तो भाजपा की रणनीतिक राह आसान होती। लेकिन जिस तरह से विधेयक के कुछ प्रावधानों को लेकर अन्नाद्रमुक और तेलुगू देशम जैसी पार्टियां भी नाराज हैं उससे विधेयक की राह तो मुश्किल हुई ही है, भाजपा की रणनीति भी निष्कंटक नहीं रह गई है।

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