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संपादकीयः तेल की धार

प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी का यह आह्वान दरअसल वक्त की मांग है कि तेल की कीमतों का निर्धारण तर्कसंगत तरीके और जिम्मेदारी से किया जाए।

Author April 13, 2018 02:29 am

प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी का यह आह्वान दरअसल वक्त की मांग है कि तेल की कीमतों का निर्धारण तर्कसंगत तरीके और जिम्मेदारी से किया जाए। बुधवार को अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा मंच के सोलहवें मंत्रिस्तरीय सम्मेलन को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि गैर-वाजिब तरीकों से कच्चे तेल की कीमतों को प्रभावित करना ठीक नहीं है और इसकी वाजिब कीमत तय करने के लिए विश्व-स्तर पर सहमति बननी चाहिए। इस सम्मेलन में सऊदी अरब, ईरान और कतर जैसे प्रमुख तेल उत्पादक देशों के मंत्रियों ने शिरकत की। आखिर मोदी को तेल के दाम की बाबत जिम्मेदारी पर जोर देने की जरूरत क्यों महसूस हुई? असल में इस समय कच्चे तेल की कीमत चढ़ी हुई है और यह सत्तर डॉलर प्रति बैरल के साथ साढ़े चार साल के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई है। यह यों ही नहीं हुआ है। सऊदी अरब समेत तेल उत्पादक देशों के संगठन यानी ओपेक ने उत्पादन में कटौती करके कच्चे तेल की कीमत को यहां तक पहुंचाया है। हालांकि रूस ओपेक में शामिल नहीं है, पर कोई सवा साल से वह भी सऊदी अरब के साथ मिल कर कच्चे तेल की कीमत बढ़ाने की रणनीति पर काम करता रहा है। यही नहीं, सऊदी अरब ने पिछले दिनों कहा था कि कच्चा तेल प्रति बैरल अस्सी डॉलर तक जा सकता है। इससे भारत का चिंतित होना स्वाभाविक है।

भारत अपनी जरूरत या खपत का अस्सी फीसद तेल आयात करता है। अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत चढ़ती है, तो भारत की अर्थव्यवस्था पर इससे दोहरी मार पड़ती है। एक तो यह कि आयात का खर्च बढ़ जाने से व्यापार घाटा बढ़ता है। दूसरे, पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ाने पड़ते हैं, इसके फलस्वरूप परिवहन और ढुलाई की लागत बढ़ती है और इसका नतीजा बहुत सारी चीजों की मूल्यवृद्धि के रूप में आता है। ऐसे वक्त में, जब आने वाले विधानसभा चुनावों और फिर लोकसभा चुनावों के लिए सरकार खुद को राजनीतिक रूप से तैयार करने में लगी हो, पेट्रोल और डीजल की कीमतें उसके लिए परेशानी का सबब साबित हो सकती हैं। लेकिन क्या प्रधानमंत्री की अपील रंग लाएगी? क्या ओपेक में शामिल देश कच्चे तेल की कीमत में कमी करेंगे, या कम से कम और चढ़ने नहीं देंगे? इस तरह की उम्मीद पालना अति उत्साह होगा, क्योंकि ऐसी चीजें व्यापारिक स्वार्थ और दुनियादारी के हिसाब से चलती हैं। इसलिए भारत जैसे बड़े पैमाने पर तेल आयात करने वाले देशों को अपने स्तर पर रणनीति बनानी होगी।

इसमें पहला तकाजा यह है कि तेल पर निर्भरता घटाई जाए और दूसरे स्रोतों से ऊर्जा पाने की तकनीक का अधिक से अधिक विकास और प्रसार किया जाए। यों चुनावी साल के मद््देनजर राहत की कुछ कवायद सरकार ने शुरू कर दी है। मसलन, सरकार ने वित्तमंत्री और पेट्रोलियम मंत्री को तेल और गैस ब्लॉक आबंटित करने की अनुमति दे दी है। इस फैसले से लाइसेंस देने में तेजी आएगी और कारोबार में सहूलियत होगी। पहले इस तरह का आबंटन करने का अधिकार मंत्रिमंडल को ही था। ओपेक की आंच से बचने के लिए अमेरिका, अजरबैजान आदि देशों से तेल की खरीदारी शुरू की गई है। भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल-खरीदार है। इससे जहां बाहर से तेल मंगाने की उसकी जरूरत या मजबूरी का अंदाजा लगता है, वहीं यह तथ्य इस बात की ओर भी संकेत करता है कि भारत तेल के विश्व-बाजार के गणित को प्रभावित कर सकता है। इसलिए मोदी की अपील को तेल उत्पादक देशों को हल्के ढंग से नहीं लेना चाहिए।

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