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संपादकीयः बेलगाम जुबान

चुनाव प्रचार के दौरान सभाओं और रैलियों में हमारे माननीय, जनप्रतिनिधि, उम्मीदवार और बड़े से लेकर छुटभैये नेता जिस तरह की अभद्र भाषा का खुल कर और गर्व के साथ प्रयोग कर रहे हैं, वह शर्मनाक तो है ही, गंभीर चिंता का विषय भी है। राजनीति के ये कर्णधार खुले तौर पर आचार संहिता की […]

Author Published on: April 17, 2019 1:21 AM
समाजवादी पार्टी के नेता आजम खान अक्सर अपने विवादित बयानों को लेकर चर्चा में रहते हैं। (फाइल फोटो)

चुनाव प्रचार के दौरान सभाओं और रैलियों में हमारे माननीय, जनप्रतिनिधि, उम्मीदवार और बड़े से लेकर छुटभैये नेता जिस तरह की अभद्र भाषा का खुल कर और गर्व के साथ प्रयोग कर रहे हैं, वह शर्मनाक तो है ही, गंभीर चिंता का विषय भी है। राजनीति के ये कर्णधार खुले तौर पर आचार संहिता की धज्जियां उड़ा रहे हैं, धमकी भरे लहजे में वोट मांग रहे हैं और अनुकूल परिणाम नहीं मिलने पर नतीजे भुगतने की धमकी दे रहे हैं। खासतौर पर सरेआम महिलाओं के बारे में बेहद आपत्तिजनक टिप्पणी हतप्रभ कर देने वाली है। मंच से किसी को गाली देना बता रहा है कि देश को दिशा देने वालों का किस कदर पतन हो चुका है। सब कुछ मानो इस अंदाज में चल रहा है कि देखते हैं, क्या बिगाड़ता है चुनाव आयोग! यह चुनाव आयोग को खुली चुनौती है। यों अशिष्ट और गाली-गलौच वाली भाषा का इस्तेमाल हमारे राजनेताओं के लिए कोई शर्म या झिझक की बात नहीं है, क्योंकि यह इनकी संस्कृति का ऐसा अभिन्न हिस्सा बन चुका है जिसे सदनों के भीतर से लेकर बाहर तक लोग सुनते हैं। ताज्जुब तो इस बात का है कि ऐसे शब्दबाणों का इस्तेमाल करने वाले इस बात से जरा भयभीत नहीं हैं कि आचार संहिता लगी हुई है और उन्हें इसकी मर्यादा का पालन करना है।

लेकिन अब देश की सर्वोच्च अदालत ने चुनाव आयोग पर बदजुबानी करने वाले ऐसे नेताओं की खबर लेने के लिए दबाव बनाया है। आयोग ने अपनी तरफ से पहल करते हुए अब तक ऐसी कोई सक्रियता नहीं दिखाई थी जिससे कोई सख्त संदेश जाता। वरना सुप्रीम कोर्ट को यह कहने को क्यों मजबूर होना पड़ता कि ‘आयोग अभी तक नोटिस ही जारी कर रहा है, कोई सख्त कार्रवाई क्यों नहीं कर रहा’! आयोग को लेकर सर्वोच्च अदालत की यह टिप्पणी काफी गंभीर है। इसके बाद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, समाजवादी पार्टी के नेता आजम खां, बसपा प्रमुख मायावती और केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी पर कार्रवाई कर चुनाव आयोग ने सख्त संदेश देने की कोशिश की।

हैरानी की बात तो यह है कि इनमें से किसी को भी अपने आपत्तिजनक बोल का अफसोस नहीं है। उल्टे योगी आदित्यनाथ गर्व के साथ सफाई दे रहे हैं कि ‘अली-बजरंगबली’ और ‘हरा वायरस’ जैसे शब्दों के पीछे उनका आशय क्या था। और बदजुबानी की पराकाष्ठा तो तब दिखी जब रविवार को हिमाचल प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष सतपाल सत्ती ने कांग्रेस अध्यक्ष को मंच से ही गाली दे दी। सोशल मीडिया पर उनका यह वीडियो सब कुछ बता रहा है। इसी दिन कर्नाटक के प्रदेश भाजपा अध्यक्ष ने एक चुनावी सभा में अल्पसंख्यक समुदाय के खिलाफ जहर उगलने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

चुनाव प्रचार के दौरान जिस तरह से खुल कर अशिष्ट भाषा का इस्तेमाल होने लगा है, वह राजनीति में हो रहे पतन का संकेत है। एक तरफ तो राजनीतिक पार्टियां शुचिता की बात करती हैं और दूसरी ओर ऐसे बोल बोलने वालों के खिलाफ कोई कदम तक नहीं उठातीं, बल्कि शर्मनाक तो यह है कि हर दल ऐसे अभद्र शब्दों का प्रयोग करने वाले अपने नेता के बचाव में खुल कर उतर आता है। सवाल है क्या मंच से गाली देने वाले नेता को उसके पद पर बनाए रखा जाना चाहिए? एक महिला के लिए अश्लील शब्द बोलने वाले वरिष्ठ नेता के खिलाफ पार्टी को कठोर कार्रवाई नहीं करनी चाहिए? नेताओं की जुबान पर लगाम लगाने की जिम्मेदारी चुनाव आयोग की तो बनती ही है, राजनीतिक दलों को भी अपने ऐसे नेताओं को सभ्यता और शिष्टाचार पाठ पढ़ाना होगा।

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