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संपादकीयः संकट का तापमान

बढ़ते वैश्विक तापमान के संदर्भ में लगभग हर मौके पर कार्बन डाइऑक्साइड के बेलगाम उत्सर्जन पर रोक लगाने को लेकर जताई जाने वाली चिंता के बरक्स हकीकत यह है कि इस समस्या की जटिलता में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है।

Author Updated: January 28, 2020 3:02 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

पर्यावरण के सामान्य चक्र में आ रहे बदलावों की अनदेखी या फिर उसमें जाने-अनजाने बाधा पहुंचाने का नतीजा क्या हो सकता है, अब यह सामने आने लगा है। हालांकि पिछले दो-तीन दशकों से लगातार इस मसले पर होने वाले अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में गहरी चिंता जताई जाती रही है और जलवायु में होने वाली उथल-पुथल के व्यापक परिणामों को लेकर चेतावनियां भी जारी हुई हैं। विडंबना यह है कि लगभग सारी तस्वीर साफ होने के बावजूद शायद ही दुनिया भर में तापमान में वृद्धि रोकने को लेकर गंभीरता दिखाई देती है। नतीजतन, अब तक होने वाले अध्ययनों में जो आशंकाएं जताई जाती रहीं, वे अब प्रत्यक्ष खतरे के रूप में सामने आने लगी हैं।

अंतरराष्ट्रीय शोध संस्थान मेकेंजी ग्लोबल इंस्टीट्यूट की हाल ही प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक अगले दस सालों तक जलवायु परिवर्तन का असर विभिन्न देशों के सकल घरेलू उत्पाद पर भी साफतौर पर दिखने लगेगा। इसका कारण यह होगा कि मौसम में गरमी बढ़ेगी और उमस से पैदा होने वाली शारीरिक-मानसिक शिथिलता के चलते लोगों की कार्यक्षमता में कमी आने के साथ-साथ उनके काम करने के घंटों में तेजी से कमी आएगी। रिपोर्ट के मुताबिक आने वाले सालों में जलवायु परिवर्तन के संभावित खतरों की जद में शामिल एक सौ पांच देशों के प्राकृतिक एवं मानव संसाधन को प्रत्यक्ष जोखिम का सामना करना पड़ सकता है।

यह एक सामान्य-सी तस्वीर है, जिसे महज आशंका मान कर दरकिनार करना एक बड़े खतरे को न्योता देने की तरह होगा। पिछले कई सालों से दुनिया भर में मौसम में अप्रत्याशित उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहे हैं। विश्व के किसी हिस्से में अपेक्षा से ज्यादा तापमान दर्ज किया जाता है तो कहीं गरमी के मौसम की अवधि लंबी हो रही है। पिघलते हिमनद अब यथार्थ हैं और एक बड़े खतरे के तौर पर देखे जा रहे हैं। इसकी वजह से समुद्र के जलस्तर में होने वाली मामूली बढ़ोतरी के नतीजे में पृथ्वी का क्या स्वरूप हो जा सकता है, इसकी कल्पना कोई भी कर सकता है। इन सबका असर मानव समाज पर किस तरह पड़ रहा है, यह भी किसी से छिपा नहीं है।

सवाल है कि प्रत्यक्ष जोखिम से बचने या उससे लड़ने के मामले में ही जब कोई ठोस पहलकदमी नहीं हो पा रही है तो परोक्ष और दीर्घकालिक खतरों से कैसे निपटा जाएगा! लोगों की घटती कार्यक्षमता के कारण उनके काम की अवधि में कमी आने से व्यक्ति, परिवार के सामने जो आर्थिक चुनौतियां पैदा होंगी, श्रम उत्पादकता के साथ-साथ सकल घरेलू उत्पाद तक में जो कमी आएगी, उसके लिए कौन जिम्मेदार होगा?

खासतौर पर भारत की अर्थव्यवस्था पहले ही नाजुक हालत से गुजर रही है। ऐसे में अगर रिपोर्ट में जताई गई आशंका के मुताबिक श्रमिकों के काम के घंटों में बीस फीसद तक की कमी आने से भारतीय अर्थव्यवस्था में जीडीपी में 2.5 फीसद से 4.5 फीसद तक की गिरावट आई, तो क्या हम भावी आर्थिक चुनौतियों का अंदाजा लगा सकते हैं?

बढ़ते वैश्विक तापमान के संदर्भ में लगभग हर मौके पर कार्बन डाइऑक्साइड के बेलगाम उत्सर्जन पर रोक लगाने को लेकर जताई जाने वाली चिंता के बरक्स हकीकत यह है कि इस समस्या की जटिलता में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है। दुनिया के विकसित देश कार्बन उत्सर्जन के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार हैं, लेकिन जैसे ही इसे जलवायु तापमान के सबसे गंभीर कारक के रूप में पेश किया जाता है, आरोप तीसरी दुनिया या विकासशील देशों पर थोप कर उन्हें ही इस पर लगाम लगाने की सलाह दी जाती है। क्या इसी तरह जिम्मेदारियों के टालमटोल से इस गंभीर और व्यापक समस्या का हल निकाला जा सकेगा?

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