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संपादकीयः कश्मीर की गुत्थी

कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है, इस बात से शायद ही कोई राजनीतिक दल इनकार करे।

Author October 30, 2017 2:21 AM

कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है, इस बात से शायद ही कोई राजनीतिक दल इनकार करे। पर जब-जब वहां आजादी की मांग उठती है, कई बार राजनीतिक दलों के रुख में विरोधाभास नजर आने लगता है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी चिदंबरम के ताजा बयान को लेकर उठा विवाद इसी का ताजा उदाहरण है। उन्होंने कहा कि कश्मीरियों की आजादी की मांग दरअसल अनुच्छेद तीन सौ सत्तर में वर्णित स्वायत्तता की मांग है। भाजपा शुरू से धारा तीन सौ सत्तर को हटाने की वकालत करती रही है, इसलिए स्वाभाविक रूप से चिदंबरम के बयान पर उसने आपत्ति जाहिर की है। इन दिनों जिस तरह कश्मीर समस्या काफी जटिल होती गई है, वहां सुरक्षा बलों को आतंकी घटनाओं से निपटने में स्थानीय लोगों के विरोध का सामना करना पड़ता है। आजादी के नारों के साथ पत्थरबाजी की घटनाएं जैसे रोज का सिलसिला बन चुकी हैं, उसमें चिदंबरम के बयान पर आपत्ति होनी ही थी। हालांकि चिदंबरम भी कश्मीर को भारत का अभिन्न हिस्सा मानते हैं, पर उनका कहना है कि अगर कश्मीर को अधिक स्वायत्तता दी जाए तो वहां समस्याओं पर काबू पाना आसान हो जाएगा।

यह सही है कि केंद्र और जम्मू-कश्मीर में भाजपा के सत्ता में आने के बाद कश्मीर में आतंकी घटनाएं बढ़ी हैं, घाटी के लोगों ने आजादी के नारे के साथ सड़कों पर उतर कर कानून-व्यवस्था के लिए चुनौतियां खड़ी की हैं। इसकी एक वजह तो यह है कि केंद्र ने वहां के लोगों से बातचीत का सिलसिला रोक कर हथियार के जरिए दहशतगर्दी पर काबू पाने का रास्ता निकालना ज्यादा उचित समझा। घाटी में रोजगार के अवसर न होने, विकास परियोजनाएं देश के दूसरे हिस्सों की अपेक्षा कम होने के चलते वहां के युवाओं में निराशा अधिक है, इसलिए वे दहशतगर्दों के बहकावे में जल्दी आ जाते और हाथ में पत्थर लेकर सड़कों पर उतर जाते हैं। उन्हें मुख्यधारा में लाना और पत्थर की जगह उनके हाथ में कोई काम देना सरकार के लिए बड़ी चुनौती है। पर इसके साथ ही सीमा पार से आतंकी गतिविधियों को मिल रहे बढ़ावे को रोकना भी कठिन काम है। केंद्र सरकार ने पहले चरमपंथी और अलगाववादी संगठनों के सीमा पार से संबंधों को अवरुद्ध कर घाटी में अमन बहाली करना ज्यादा जरूरी समझा। इसका अर्थ यह नहीं कि वह कश्मीरी अवाम या कश्मीरियत के विरुद्ध है। पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आने के बावजूद उसने अगर अनुच्छेद तीन सौ सत्तर को छेड़ना जरूरी नहीं समझा, तो शायद इसीलिए कि वह पहले घाटी में अमन बहाली ज्यादा जरूरी समझती है।

कश्मीर को लेकर चिदंबरम की मंशा भले सही हो, पर इस समय घाटी में जैसे हालात हैं, उसमें स्वायत्तता की बात करना एक तरह से अलगाववादी तत्त्वों को प्रश्रय देने जैसा है। केंद्र सरकार ने हुर्रियत नेताओं की गतिविधियों और उनके बैंक खातों पर कड़ी नजर रखनी शुरू की है, जिसके सकारात्मक नतीजे भी देखे गए हैं। पर स्थानीय लोगों पर अलगाववादियों के बहकावे का असर कम नहीं हो पाया है। यही वजह है कि वे अक्सर सुरक्षा बलों के कामकाज में बाधा खड़ी करते रहते हैं। यह सही है कि इसके लिए आतंकी और अलगाववादी संगठनों पर नकेल कसने के साथ-साथ घाटी के लोगों का भारोसा जीतने का भी प्रयास होते रहना चाहिए। इस दिशा में सरकार को सोचने की जरूरत है, पर इसका यह अर्थ नहीं कि कश्मीर की स्वायत्तता का सवाल उठा कर वहां सुरक्षा-व्यवस्था की चुनौतियों से जूझ रहे सशस्त्र बलों का मनोबल कमजोर करने का प्रयास किया जाए।

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