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संपादकीयः चंद्रयान की राह

चंद्रयान 2 के बाद कमोबेश हर प्रक्षेपण में भारत ने साबित किया है कि इस कसौटी पर हम दुनिया के विकसित देशों के समांतर खड़े हो चुके हैं। अंतरिक्ष में व्यावसायिक प्रक्षेपण के मामले में बेहतर सुविधाओं के लिहाज से कई देशों ने भारत की ओर देखा है।

मानव के चांद पर पहुंचने के पचासवें वर्ष के रूप में मनाया जा रहा है।

अंतरिक्ष में प्रयोग और परीक्षण के मामले में भारत ने जिस तरह अपनी जगह बनाई है, उसे देखते हुए किसी नए अभियान को लेकर देश और दुनिया में अपेक्षाएं स्वाभाविक हैं। अब तक के कमोबेश हर प्रक्षेपण में भारत ने साबित किया है कि इस कसौटी पर हम दुनिया के विकसित देशों के समांतर खड़े हो चुके हैं। अंतरिक्ष में व्यावसायिक प्रक्षेपण के मामले में बेहतर सुविधाओं के लिहाज से कई देशों ने भारत की ओर देखा है। लेकिन यह भी ध्यान रखने की जरूरत है कि तकनीक की दुनिया में कभी-कभार ऐसी स्थिति पैदा हो सकती है कि पूरी तैयारी से शुरू होने वाले किसी प्रक्षेपण को अचानक ही टाल देना पड़े। रविवार की रात चंद्रयान-2 के प्रक्षेपण में तकनीकी अड़चन अचानक ही खड़ी हो गई, जिसकी वजह से फिलहाल इस अभियान को स्थगित कर देना पड़ा है। खबरों के मुताबिक जीएसएलवी मार्क-3 रॉकेट के स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन के तरल र्इंधन में रिसाव होने लगा था। प्रक्षेपण के लिए जितने दबाव की जरूरत थी, वह नहीं बन पा रहा था। ऐसे में अगर इसकी अनदेखी करके यान का प्रक्षेपण कर दिया जाता तो इसके विफल होने की ही आशंका कई गुना ज्यादा थी। लिहाजा, फिलहाल इसे टाल देना बेहतर रास्ता था।

इसके बावजूद यह तथ्य है कि चंद्रयान-2 को चांद पर भेजने के लिए जिस स्तर की तैयारी हो चुकी है, वह किसी मामूली कारण से भी रद्द नहीं हो सकता। इसलिए इसरो की ओर से अब यह खबर आई है कि जिन वजहों से यह मिशन टालना पड़ा, उनका पता लगाने और उन्हें पूरी तरह दुरुस्त करने के बाद संभवत: इसी महीने चंद्रयान-2 को फिर से अपने लक्ष्य की ओर रवाना किया जा सकेगा। पहली नजर में चंद्रयान-2 के प्रक्षेपण को टालने को एक कमी के तौर पर देखा जा सकता है, जिसमें सफलता के लिए सौ फीसद सुरक्षित अनिवार्य मानकों के आकलन में थोड़ी चूक हुई। लेकिन इसरो के वैज्ञानिकों की इस बात के लिए तारीफ भी की जानी चाहिए कि उन्होंने उड़ान के पहले ही उस मुख्य वजह की पहचान कर ली और इस तरह एक बड़ी नाकामी और नुकसान से देश को बचाया जा सका। वरना इस खामी के रहते अगर किसी तरह प्रक्षेपण को अंजाम दे दिया जाता और उड़ान के बाद गड़बड़ी की वजह से हादसा होता तो होने वाले नुकसान का अंदाजा भर लगाया जा सकता है। इसलिए चंद्रयान-2 के प्रक्षेपण को फिलहाल टालने को एक सही फैसला कहा जाना चाहिए।

दरअसल, चंद्रयान-2 अभियान की सबसे खास बात यह है कि इसके लैंडर और रोवर सत्तर डिग्री के अक्षांश पर चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर जा रहे हैं। अब तक किसी और देश ने चंद्रमा के इस क्षेत्र में जाने की हिम्मत नहीं की है। इस यान की एक खासियत यह है कि इसके ऑर्बिटर, लैंडर और रोवर भारत में ही निर्मित हैं। इसरो के मुताबिक इस यान के जरिए वहां की चट्टानों को देख कर मैग्निशियम, कैल्शियम और लोहे जैसे खनिज को खोजने की कोशिश की जाएगी। इसके अलावा, वहां पानी होने के संकेत की तलाश और चांद की बाहरी परत की जांच की जाएगी। गौरतलब है कि भारत ने इससे पहले 2008 में चंद्रयान-1 को चंद्रमा की कक्षा में भेजने में कामयाबी हासिल की थी। हालांकि वह यान चंद्रमा की सतह पर उतरा नहीं था। अब तक चांद की सतह पर केवल अमेरिका, रूस और चीन उतर सके हैं। अगर चंद्रयान-2 मिशन कामयाब हो जाता है तो भारत भी इन देशों की सूची में शामिल चौथा देश हो जाएगा। जाहिर है, इसरो एक और इतिहास रचने की ओर कदम बढ़ा रहा है

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