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संपादकीयः तार्किक परिणति

संसद के शीतकालीन सत्र के पहले ही दिन केंद्रीय मंत्रिमंडल ने तीन तलाक को अवैध ठहराने वाले कानून के मसविदे को हरी झंडी दे दी।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद मुस्लिम महिलाएं हुईं खुश

संसद के शीतकालीन सत्र के पहले ही दिन केंद्रीय मंत्रिमंडल ने तीन तलाक को अवैध ठहराने वाले कानून के मसविदे को हरी झंडी दे दी। लिहाजा, संबंधित विधेयक इसी सत्र में संसद में पेश किया जाएगा और इस बात की पूरी उम्मीद है कि उसे संसद की मंजूरी मिल जाएगी। गौरतलब है कि अगस्त में तीन तलाक के खिलाफ आए सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का सभी दलों ने स्वागत किया था। इस दिशा में कानून बने, यह उस फैसले का अनिवार्य तकाजा था। हालांकि अदालत का फैसला आने के बाद भी, सरकार ने शुरू में कहा था कि इस बारे में कानून बनाने का उसका इरादा नहीं है। पर बाद में उसे अहसास हुआ होगा कि कानून बनाना ही सर्वोच्च न्यायालय के फैसले की तार्किक परिणति होगी; कानून नहीं बना तो फैसला व्यवहार में बेमानी हो जाएगा। अदालत का फैसला मुसलिम महिलाओं के संघर्ष की जीत माना गया। वही बात प्रस्तावित कानून के बारे में भी कही जा सकती है। कानून बनाना फैसले को अमली रूप देने के लिए तो जरूरी है ही, इस तथ्य के मद््देनजर भी जरूरी है कि अदालती फैसले के बाद भी तीन तलाक प्रथा के जरिए तलाक के कोई सड़सठ मामले सामने आए। अब ऐसा करना आसान नहीं रह गया है, क्योंकि प्रस्तावित कानून ने तुरंता तीन तलाक को अपराध ठहराया है, और यह अपराध करने वाले पति को तीन साल की जेल हो सकती है, जुर्माना भी हो सकता है। विधेयक के कानून बन जाने पर पीड़िता को मजिस्ट्रेट से फरियाद करने और अपने तथा अपने आश्रित बच्चों के लिए गुजारा-खर्च पाने का अधिकार होगा।

तुरंता तीन तलाक या ‘तलाक-ए-बिद््दत’ दशकों से काफी विवादास्पद मसला रहा है। शायद यही कारण है कि इस पर सुनवाई करने वाले सर्वोच्च न्यायालय के जजों में भी सर्वसम्मति नहीं बन पाई थी। संबंधित पीठ के पांच जजों में से दो जज फैसले से असहमत थे। विवाद की बुनियाद में दो अलग-अलग आग्रह और दृष्टिकोण थे। आॅल इंडिया मुसलिम पसर्नल लॉ बोर्ड और दूसरे भी कई मुसलिम संगठन जहां इस मामले को यानी तीन तलाक को खत्म करने की मांग को अपने पारंपरिक रीति-रिवाज में दखल और अपनी धार्मिक स्वायत्तता पर हमले के रूप में देखते थे, वहीं मुसलिम महिलाओं के संगठनों के लिए यह मुद्दा न्याय के लिए अपनी आवाज उठाने का था। सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के व्यापक स्वागत को देखते हुए विरोध कर चुकी संस्थाएं भी खामोश हो गर्इं। जैसा कि सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा था, यह कानून के समक्ष समानता का मामला है, जिसकी गारंटी संविधान के अनुच्छेद चौदह में दी हुई है। इसका यह अर्थ नहीं कि संविधान ने धार्मिक स्वायत्तता को मान्य नहीं किया है। पर धार्मिक स्वायत्तता उसी हद तक हो सकती है जब तक वह नागरिक अधिकारों के आड़े न आए।

शनि शिंगणापुर और हाजी अली की दरगाह में प्रवेश के मामलों में फैसला सुनाते समय मुंबई उच्च न्यायालय ने भी धार्मिक स्वायत्तता की इस सीमा और कानून के समक्ष समानता के सिद्धांत या प्रावधान को रेखांकित किया था। सर्वोच्च न्यायालय के फैसले और अब केंद्र सरकार की पहल, दोनों का यही अर्थ है कि परंपरा या प्रथा के नाम पर किसी के नागरिक अधिकार का हनन नहीं किया जा सकता। आखिरकार तीन तलाक के खिलाफ मुसलिम महिलाओं का संघर्ष रंग लाया। यह उनकी जीत है। संविधान सर्वोपरि है। तीन तलाक को अवैध और आपराधिक कृत्य ठहराने वाले कानून की पहल संविधान की बुनियाद और संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप है और इसे इसी नजरिये से देखा जाना चाहिए।

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