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संपादकीयः चंदे पर फंदा

आखिरकार सरकार ने चुनावी बांड की रूपरेखा पेश कर दी। चुनाव सुधार की दिशा में कठोर कदम उठाने वालों की लंबे समय से मांग थी कि इसके लिए चुनावी चंदे को पारदर्शी बनाने की जरूरत है।

Author January 4, 2018 2:52 AM
वित्तमंत्री अरुण जेटली

आखिरकार सरकार ने चुनावी बांड की रूपरेखा पेश कर दी। चुनाव सुधार की दिशा में कठोर कदम उठाने वालों की लंबे समय से मांग थी कि इसके लिए चुनावी चंदे को पारदर्शी बनाने की जरूरत है। केंद्र सरकार के इस फैसले से निस्संदेह ऐसे लोगों को कुछ संतोष मिलेगा। अब कोई व्यक्ति या संस्था किसी राजनीतिक दल को चुनावी चंदा देना चाहती है, तो वह स्टेट बैंक आॅफ इंडिया की चुनिंदा शाखाओं से एक हजार, दस हजार, एक लाख, दस लाख और एक करोड़ रुपए मूल्य के बांड खरीद सकेगी। इन बांडों को खरीदने वालों के लिए अपने बैंक को अपने बारे में पूरी जानकारी उपलब्ध करानी होगी। हालांकि बांड पर दान देने वाले की पहचान गुप्त रखी जाएगी। चुनावी बांड के जरिए सिर्फ उन्हीं पार्टियों को चंदा दिया जा सकेगा, जो चुनाव आयोग में पंजीकृत हैं और पिछले लोकसभा या विधानसभा चुनाव में कम से कम एक प्रतिशत मत प्राप्त कर चुकी हैं। इस तरह माना जा रहा है कि नकदी के रूप में दिए जाने वाले चुनावी चंदे पर रोक लगेगी और काले धन पर काफी हद तक अंकुश लगेगा। मगर कुछ लोगों को इससे चुनाव सुधार की दिशा में किसी गुणात्मक परिवर्तन को लेकर संदेह है।

पिछले कुछ सालों में जिस तरह चुनाव खर्च लगातार बढ़ता गया है और निर्वाचन आयोग की तमाम सख्तियों के बावजूद राजनीतिक दल अपने खर्च पर अंकुश लगाने की चेष्टा करते नहीं दिखते उसमें ऐसे कदम की अपेक्षा की जा रही थी। चुनावी खर्च पर अंकुश न लग पाने का एक बड़ा कारण चंदे के रूप में काले धन को छिपाया जाना है। कुछ साल पहले तक पार्टियां लोगों से नगद चंदा लेने और उनकी पहचान छिपाने को स्वतंत्र थीं। इस तरह कंपनियों और कारोबारियों को अपने काले धन को बड़े पैमाने पर छिपाने में मदद मिलती थी। फिर उसके बदले वे नाजायज लाभ लेने का प्रयास करते थे। पर मोदी सरकार ने नगद चंदे पर अंकुश लगाते हुए उसकी सीमा पहले बीस हजार रुपए और फिर बाद में उसे घटा कर महज दो हजार रुपए कर दिया। फिर भी पिछले दिनों हुए चुनावों में पार्टियों और प्रत्याशियों के खर्च में कहीं से कोई कमी नहीं दिखाई दी। इसलिए कि राजनीतिक दलों ने चंदा जुटाने के दूसरे रास्तों का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है। ऐसे में वे सिर्फ बांड के जरिए चंदा लेंगे, दावा करना मुश्किल है।

पिछले साल अप्रैल में एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स ने राजनीतिक दलों को चंदा देने वाले ट्रस्टों पर संदेह जाहिर किया था। 2013 से पहले छह चुनावी ट्रस्ट पंजीकृत हुए थे। कायदे से इन चुनावी ट्रस्टों को निर्वाचन आयोग के पास अपने दानदाताओं के बारे में जानकारी उपलब्ध कराना अनिवार्य है, पर वे ऐसा नहीं करते। 2014-15 में इन ट्रस्टों ने 177.55 करोड़ रुपए चंदे के रूप में कमाए और नियम के मुताबिक इसका पंचानबे फीसद अलग-अलग राजनीतिक दलों को वितरित किया। इसी तरह यह भी देखने में आया है कि कई लोग फर्जी कंपनियां खोल कर चेक या फिर चुनावी ट्रस्टों के माध्यम से पार्टियों को चंदा देते रहे हैं। ऐसे में चुनावी चंदे को पूरी तरह पारदर्शी बनाने के लिए कोई व्यावहारिक रास्ता अपनाने की दरकार अभी खत्म नहीं हुई है। चुनावी बांड की तरह दूसरे रास्तों से आने वाले चंदों को भी पारदर्शी बनाया जाना चाहिए। पार्टियों के आय-व्यय के ब्योरे भी पारदर्शी और व्यावहारिक बनाने के उपाय होने चाहिए।

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