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संपादकीयः सुरक्षा का बल

जिस समय पाकिस्तान और चीन की सीमा से सटे इलाकों में लगातार तनाव या टकराव की खबरें आ रही हैं, उसमें यह बात चिंता में डालने वाली है कि भारतीय सशस्त्र बलों में बड़ी तादाद में सैनिकों के पद खाली पड़े हैं।
Author April 5, 2018 03:31 am
रक्षामंत्री निर्मला सीतारमण

जिस समय पाकिस्तान और चीन की सीमा से सटे इलाकों में लगातार तनाव या टकराव की खबरें आ रही हैं, उसमें यह बात चिंता में डालने वाली है कि भारतीय सशस्त्र बलों में बड़ी तादाद में सैनिकों के पद खाली पड़े हैं। हैरानी की बात यह है कि एक ओर किसी भी सैन्य हमले की स्थिति में देश के तैयार होने का दावा किया जाता है, दूसरी ओर भारी पैमाने पर सैनिकों की कमी के आंकड़े पेश किए जा रहे हैं। मंगलवार को राज्यसभा में एक सवाल के जवाब में रक्षामंत्री ने बताया कि तीनों सेनाओं में बावन हजार से ज्यादा कर्मियों की कमी है। हालांकि चौदह लाख से ज्यादा सैनिकों की स्वीकृत संख्या में बावन हजार कर्मियों की कमी कोई बड़ी चिंता का मामला नहीं है, लेकिन सैन्य तैयारियों और उनकी संवेदनशीलता के मद्देनजर देखें तो कई बार ऐसी छोटी संख्या को भी नजरअंदाज करना उचित नहीं होता। अगर रक्षा बजट से लेकर सेना की हर जरूरत पूरी करने के किसी भी मोर्चे पर सरकार सजग है, तो इतनी बड़ी तादाद में सैन्यकर्मियों की कमी का मुद्दा हाशिये पर क्यों दिखता है।

यों सरकार ने सशस्त्र बलों में सैनिकों की कमी को दूर करने के लिए कई कदम उठाने की बात कही है। मगर ऐसे आश्वासन लंबे समय से पेश किए जाते रहे हैं और हालात में कोई बड़ा फर्क नहीं आया है। तकरीबन तीन साल पहले तत्कालीन रक्षामंत्री मनोहर पर्रीकर ने भी लोकसभा में बावन हजार पद रिक्त होने की बात कही थी। सवाल है कि जब हथियारों और लड़ाकू विमानों के सौदों पर भारी खर्च किए जाने की खबरें आ रही हैं, उसमें सैनिकों की कमी के मामले में इस स्तर की उदासीनता कितनी वाजिब है! क्या यह स्थिति भर्तियों के प्रति ढीले-ढाले रवैये या फिर सैन्य सेवाओं के प्रति युवाओं के आकर्षित न होने का नतीजा है? अगर ऐसा है तो इससे निपटने के लिए सरकार क्या कर रही है? कई साल पहले से युवाओं को सेना में शामिल करने के लिए सरकार कई उपाय करने की बात कह रही है। इस बार भी कहा गया है कि सैनिकों की कमी दूर करने के लिए देश के हरेक हिस्से में भर्ती जोनों की संख्या बढ़ाई गई है, सोशल मीडिया के प्रयोग के अलावा आॅनलाइन प्रक्रिया पर खास जोर देने के साथ-साथ चयन के तौर-तरीके को आसान बनाया जा रहा है।

मगर यह ध्यान रखने की जरूरत है कि सैन्य बलों में भर्तियां रोजगार के दूसरे क्षेत्रों की तरह नहीं हैं। यह देश की बाहरी और आंतरिक सुरक्षा से जुड़ा संवेदनशील मामला है। सीमा क्षेत्रों में या फिर देश के भीतर कई बार असाधारण परिस्थितियों में पर्याप्त सैनिकों की जरूरत पड़ सकती है। खासतौर पर हाल के दिनों में सीमा पर पाकिस्तान और डोकलाम क्षेत्र के बहाने चीन के जैसे रुख सामने आ रहे हैं, उसमें इस मोर्चे पर जरा भी कोताही नहीं बरती जानी चाहिए। लेकिन सशस्त्र बलों में कर्मियों की कमी की खबर के अलावा सच यह भी है कि लगभग आठ महीने पहले कैग ने संसद में पेश एक रिपोर्ट में बताया था कि देश की सेना के पास गोला-बारूद की भारी कमी है और अचानक युद्ध की स्थिति में जरूरत पड़ने पर दस दिन से भी कम की खेप मौजूद है। इन हालात में बाहरी या आंतरिक मोर्चे पर सुरक्षा के सवालों को लेकर पूरी तरह आश्वस्त कैसे रहा जा सकता है!

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