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संपादकीयः भ्रष्टाचार के विरुद्ध

आय से अधिक संपत्ति का सवाल पिछले काफी समय से देश की राजनीति में एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है। आमतौर पर सभी राजनीतिक दल चुनावों के दौरान यह आश्वासन देते हैं कि उनकी सरकार बनने के बाद वैसे लोगों को कानून के कठघरे में खड़ा किया जाएगा, जिनके पास बेहिसाब संपत्ति है और वह आय के ज्ञात स्रोतों के मुकाबले काफी ज्यादा है।

Author April 17, 2019 1:30 AM
विचित्र है कि बहुत सारे लोग सामान्य स्थितियों में अपनी आय को एक ऊंची उड़ान दे देते हैं, लेकिन उसके लिए अनिवार्य व्यवस्था यानी आयकर जमा कराना जरूरी नहीं समझते। फोटो सोर्स- इंडियन एक्सप्रेस

आय से अधिक संपत्ति का सवाल पिछले काफी समय से देश की राजनीति में एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है। आमतौर पर सभी राजनीतिक दल चुनावों के दौरान यह आश्वासन देते हैं कि उनकी सरकार बनने के बाद वैसे लोगों को कानून के कठघरे में खड़ा किया जाएगा, जिनके पास बेहिसाब संपत्ति है और वह आय के ज्ञात स्रोतों के मुकाबले काफी ज्यादा है। लेकिन शायद ही कभी बड़े रसूखदारों पर हाथ डाला जाता है। हालांकि जब कभी-कभार सरकार की नींद खुलती है तब यह जरूर लगता है कि अगर सरकारी तंत्र इस तरह की कार्रवाई करता है, तो इससे उसकी विश्वसनीयता बनी रहती है। मसलन, सोमवार को हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ओम प्रकाश चौटाला के खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय ने एक बड़ी कार्रवाई की है और उनकी पंचकूला और सिरसा में स्थित 3.68 करोड़ रुपए की संपत्तियों की कुर्की की।

विचित्र है कि बहुत सारे लोग सामान्य स्थितियों में अपनी आय को एक ऊंची उड़ान दे देते हैं, लेकिन उसके लिए अनिवार्य व्यवस्था यानी आयकर जमा कराना जरूरी नहीं समझते। जिम्मेदार नागरिक होने का दम भरने वाले आमतौर पर इस मसले पर अपने दायित्व को पूरा करने से छूट की इच्छा रखते हैं। खासतौर पर राजनीति की दुनिया में मौजूद कुछ नेता अपने आपको सारे कानूनों से ऊपर मानने लगते हैं और आय के ज्ञात स्रोतों से होने वाली आय के मुकाबले कई-कई गुना संपत्ति अर्जित कर लेते हैं। इसके पीछे कारण शायद यह होता है कि प्रवर्तन निदेशालय या संबंधित दूसरे महकमे इनके खिलाफ उतनी ही शिद्दत से कार्रवाई नहीं करते, जितना कि वे आम लोगों को कानून के कठघरे में खड़ा करने में चुस्ती दिखाते हैं।

किसी नेता के खिलाफ कार्रवाई तभी होती है जब मामला काफी आगे बढ़ गया होता है। इस लिहाज से देखें तो हरियाणा में हरियाणा में ओम प्रकाश चौटाला की संपत्ति को कुर्क किया जाना एक बड़ा कदम है। हालांकि यह कोई चौंकाने वाली घटना नहीं है और देश के दूसरे राज्यों में भी कई नेता इस तरह के मामलों में कानूनी कार्रवाई की जद में हैं। ऐसे मामले अब काफी निकल कर सामने आ रहे हैं, जिनमें किसी नेता के चुनाव जीतने के बाद कुछ सालों के भीतर ही उनकी संपत्ति में भारी इजाफा हो जाता है। जाहिर है, यह बढ़ोतरी अगर केवल उनकी घोषित आय के बूते नहीं होती है तो इसके पीछे भ्रष्ट तरीके से अर्जित धन का ही मामला हो सकता है।

करीब डेढ़ साल पहले सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार के रुख और उन नेताओं को लेकर काफी नाराजगी जताई थी, जिनकी संपत्ति दो चुनावों के बीच पांच सौ फीसद तक बढ़ गई। यह बेवजह नहीं है कि एक तरफ देश की संपत्ति में बढ़ोतरी की खबर आती है तो इसके साथ यह तथ्य भी उजागर होता है कि पिछले कुछ सालों के दौरान देश की दौलत में इजाफे का ज्यादातर हिस्सा सबसे अमीर एक फीसद वर्ग की झोली में गया है। अंदाजा लगाया जा सकता है कि बाकी जनता के हिस्से क्या और कितना आता होगा। जरूरत इस बात की है कि एक ऐसा स्थायी तंत्र बने जो समय-समय पर सांसदों, विधायकों और उनके सहयोगियों की संपत्ति पर नजर रखे और उनके आंकड़े जमा करे। आय से अधिक संपत्ति के किसी भी मामले की रिपोर्ट तैयार की जाए और उस पर जरूरी कार्रवाई की जाए। यह ध्यान रखने की जरूरत है कि सांसद या विधायक अगर आय से अधिक संपत्ति जमा करते हैं और उन्हें कानूनी कार्रवाई से घोषित-अघोषित तौर पर राहत मिलती है तो भ्रष्टाचार के बाकी मसलों के खिलाफ किसी भी लड़ाई में कामयाबी नहीं मिल सकती।

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