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संपादकीयः कोने में आप

आम आदमी पार्टी का रविवार को रामलीला मैदान में मनाया गया पांचवां स्थापना दिवस समारोह न सिर्फ फीका रहा बल्कि इस मौके पर अंतर्कलह और तीखे मनमुटाव के स्वर भी साफ सुनाई दिए।

Author November 28, 2017 2:02 AM
रामलीला मैदान में कुमार विश्वास, अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया

आम आदमी पार्टी का रविवार को रामलीला मैदान में मनाया गया पांचवां स्थापना दिवस समारोह न सिर्फ फीका रहा बल्कि इस मौके पर अंतर्कलह और तीखे मनमुटाव के स्वर भी साफ सुनाई दिए। मजे की बात यह कि एक-दूसरे को ओछा साबित करने और तंज कसने के लिए कुछ ऐतिहासिक पात्रों और मिथकों का सहारा लिया गया। संस्थापक सदस्यों में शामिल कुमार विश्वास ने पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर मंच से खुले तौर पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि ‘दूसरी पार्टियों की तरह अब आप में भी चेहरों की राजनीति होने लगी है। आंदोलन को खत्म करने का सीधा तरीका है कि उसे चेहरे में बदल दो।’ वे यहीं नहीं रुके। अपनी बात को ज्यादा धार देते हुए उन्होंने कहा, ‘अगर चंद्रगुप्त को अहंकार हो जाए तो चाणक्य का फर्ज है कि वह उसे वापस भेज दे।’ चंद्रगुप्त कौन है, यह बताने की जरूरत शायद नहीं होगी। इसका जवाब भी उसी मंच से दिया गया। केजरीवाल के बजाय उनके करीबी एवं मंत्री गोपाल राय ने कहा, ‘मीरजाफर अभी अंदर है, उसे बाहर निकालने की जरूरत है।’

अरसे से पार्टी के भीतर कुमार विश्वास के असंतुष्ट होने की खबरें आती रही हैं। ज्यादा वक्त नहीं हुआ, जब उनकी नाराजगी को खत्म करने के लिए पार्टी ने उन्हें राजस्थान का चुनाव प्रभारी बना दिया था। इसके बावजूद विवाद खत्म नहीं हुआ। हालांकि इतनी तल्खी पहली बार दिखी, जब एकदम आमने-सामने इतनी कड़वाहट के साथ बयानबाजी की गई हो, जबकि यह मौका स्थापना दिवस का था। विवाद का ताजा मामला दिल्ली में राज्यसभा की सीट को लेकर बताया जा रहा है। प्रशांत भूषण, योगेंद्र यादव, आनंद कुमार, मयंक गांधी की पंक्ति में कल कुमार विश्वास खड़े दिखाई दें तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
विडंबना है कि यह वही रामलीला मैदान था जहां जनलोकपाल आंदोलन से लेकर मुख्यमंत्री के तौर पर दो बार शपथग्रहण करने तक केजरीवाल एक बड़े नायक बनकर उभरे थे। तब रामलीला मैदान में तिल रखने की भी जगह नहीं होती थी।

मगर अब उनके पीछे न वैसी भीड़ है न उनका वह नायकत्व बचा है। भ्रष्टाचार से लड़ने और वैकल्पिक राजनीति के दावे के साथ वजूद में आई आम आदमी पार्टी इतनी जल्दी अपना नूर खो देगी, यह किसने सोचा था! यह पार्टी की जमीन खिसकने से ज्यादा एक सपने के टूटने की कहानी है, जो कि अधिक चिंताजनक है। पार्टी का यह हाल हो जाने के पीछे हाईकमान कल्चर हावी होने और संगठन के कामकाज में पारदर्शिता की कसौटी छोड़ देने जैसे कारण प्रमुख रहे हैं। ऐसे में पार्टी का भविष्य क्या है? पार्टी अब भी अपनी सेहत संवार सकती है, बशर्ते वह अपने पुराने संकल्पों को याद कर उन पर चलने का हौसला जुटा सके।

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