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संपादकीयः दागी नुमाइंदे

राजनीति में आपराधिक पृष्ठभूमि के लोगों के प्रवेश पर लंबे समय से सवाल उठाए जाते रहे हैं।

Author December 14, 2017 02:40 am
उच्चतम न्यायालय। (फाइल फोटो)

राजनीति में आपराधिक पृष्ठभूमि के लोगों के प्रवेश पर लंबे समय से सवाल उठाए जाते रहे हैं। इसके अलावा, नेताओं के किसी गैरकानूनी काम में लिप्त होने या फिर उन पर किसी अनियमितता के आरोप लगने के बाद उनकी राजनीतिक भूमिका को सीमित करने से संबंधित नियम-कायदों को भी एक कानूनी स्वरूप देने की बातें होती रही हैं। लेकिन अब तक इस दिशा में कोई ठोस पहलकदमी नहीं हो सकी है। हालांकि करीब डेढ़ महीने पहले इसी मसले पर दायर एक मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से कहा था कि दागी नेताओं पर दर्ज मुकदमों की सुनवाई के लिए विशेष अदालतें गठित की जानी चाहिए। तब अदालत ने सरकार से छह हफ्ते के भीतर यह भी बताने को कहा था कि इसमें कितना समय और धन लगेगा। इसी मसले पर मंगलवार को केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को यह सूचित किया कि नेताओं की संलिप्तता वाले आपराधिक मामलों की सुनवाई और फैसलों के लिए कम से कम बारह विशेष अदालतें गठित की जाएंगी। इसमें एक मुश्किल यह है कि इसके लिए सबसे पहले देश भर में सभी ऐसे सांसदों और विधायकों का विवरण इकट्ठा करने की जरूरत होगी, जिनके खिलाफ मामले चल रहे हैं।

गौरतलब है कि सर्वोच्च न्यायालय ने पिछले महीने एक नवंबर को केंद्र से सांसदों और विधायकों की संलिप्तता वाले उन 1581 मामलों के बारे में विवरण पेश करने का निर्देश दिया था जो 2014 के आम चुनावों के दौरान नामांकन दाखिल करने के क्रम में सामने आए थे। जाहिर है, इससे संबंधित ब्योरा इकट्ठा करने में कुछ समय लग सकता है। लेकिन अगर सरकार के भीतर राजनीति को अपराध से मुक्त करने की इच्छाशक्ति है तो उसे इस मसले पर ज्यादा टालमटोल नहीं करना चाहिए। यह किसी से छिपा तथ्य नहीं है कि अदालतों में पहुंचे मामलों में सुनवाई और फैसलों की क्या गति है। मगर राजनीतिकों से जुड़े मामलों में एक खास स्थिति यह बन जाती है कि वे किसी अपराध के आरोप को अपने साथ लिए हुए आम जनता की नुमाइंदगी कर रहे होते हैं। यह एक विडंबना से भरी हुई स्थिति है कि कोई नेता खुद किसी अपराध के आरोप के तहत अदालत के कठघरे में खड़ा हो और वही कानून बनाने या उसे लागू करने की प्रक्रिया में भी शामिल हो।

हालांकि निर्वाचन आयोग और विधि आयोग की एक सिफारिश पर अमल होता है तो आपराधिक मामलों में दोषी साबित हुए नेताओं को उम्र भर के लिए चुनाव लड़ने के अयोग्य घोषित किया जा सकता है। लेकिन अगर मौजूदा कानून-व्यवस्था में किसी आरोपी को चुनाव लड़ने और सांसद या विधायक बनने की सुविधा प्राप्त है भी तो यह अपने आप में एक सुधार का सवाल है। फिर एक पहलू यह भी है कि अब तक राजनीतिकों पर लगे आरोपों में दोषसिद्धि की दर बेहद कम रही है। ऐसे मामले हो सकते हैं, जिनमें राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता की वजह से किसी नेता को झूठे आरोपों के चलते भी मुकदमे में उलझना पड़ता है। लेकिन यह एक सामान्य स्थिति नहीं हो सकती। ऐसे तमाम मामले जगजाहिर है, जिनमें आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोग भी कानूनी प्रावधानों में राहत का फायदा उठा कर चुनाव लड़ते हैं और जीत कर विधायक या सांसद बन जाते हैं। ऐसी स्थिति में किसी आपराधिक मामलों में स्पष्ट संलिप्तता के आरोपों की सुनवाई और उन पर फैसला अगर जल्दी हो तो यह समूची भारतीय राजनीति के लिए अच्छा होगा।

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