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संपादकीय: वर्चस्व की लड़ाई

राजस्थान में गहलोत और पायलट के बीच विवाद की नींव दिसंबर 2018 में विधानसभा चुनाव के बाद ही पड़ गई थी। पायलट भी मुख्यमंत्री पद के दावेदार थे। लेकिन कांग्रेस आलाकमान ने आगामी लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री गहलोत को ही तरजीह दी थी।

Rajasthan, rajasthan congress party crisis, power crisis in rajasthan governmentराजस्थान में सत्ता पर वर्चस्व के लिए संघर्ष में गहलोत और पायलट मैदान में उतर गए हैं।

राजस्थान में कांग्रेस सरकार का संकट फिलहाल टल भले गया हो, लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट के बीच जारी टकराव अब थमने के आसार नहीं हैं। सचिन पायलट जो प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भी हैं, अब जिस तरह खुल कर बगावत पर उतर आए हैं, उससे यह साफ हो गया है कि आने वाले दिनों में सरकार में अब सब कुछ सामान्य तो नहीं रह पाएगा।

जाहिर है, गहलोत और पायलट के बीच कलह और बढ़ेगी। हालांकि सोमवार को कांग्रेस विधायक दल की बैठक में एक सौ छह विधायकों की मौजूदगी से साफ हो गया कि बहुमत सरकार के साथ है। बैठक के बाद साथ मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री के बीच मतभेद खत्म होने की बात भी कही गई, साथ ही दावा किया गया कि अब सरकार को कोई खतरा नहीं है, सरकार अपना कार्यकाल पूरा करेगी। पर मौजूदा हालात में इस बात पर आसानी से भरोसा नहीं किया जा सकता कि सरकार चला रहे ये दोनों नेता आखिर कब तक सहमति के आधार पर मिलजुल कर काम करते रहेंगे। अगर यही होता तो आज सरकार और कांग्रेस को ये दिन नहीं देखने पड़ते।

राजस्थान में गहलोत और पायलट के बीच विवाद की नींव दिसंबर 2018 में विधानसभा चुनाव के बाद ही पड़ गई थी। पायलट भी मुख्यमंत्री पद के दावेदार थे। लेकिन कांग्रेस आलाकमान ने आगामी लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री गहलोत को ही तरजीह दी थी। चुनाव में टिकट बंटवारे को लेकर भी मतभेद खुल कर सामने आए थे और इस अंदरूनी कलह की वजह से राजस्थान में कांग्रेस को ऐसी कई सीटों पर हार का सामना करना पड़ा जो उसके खाते में आसानी से आ सकती थीं।

मुख्यमंत्री पद नहीं मिलने के बाद से ही पायलट अपनी नाराजगी और विरोध व्यक्त करते रहे हैं। बाद में पायलट को उपमुख्यमंत्री पद देकर विवाद को शांत करने की कोशिश की गई। लेकिन प्रदेश के दोनों शीर्ष नेताओं में मतभेद गहराते गए। पायलट लंबे समय से आरोप लगाते रहे हैं कि उपमुख्यमंत्री के रूप में उन्हें काम नहीं करने दिया जा रहा, महत्त्वपूर्ण मसलों, तबादलों और नियुक्तियों में उनकी घोर उपेक्षा हो रही है, ऐसे में उपमुख्यमंत्री का क्या मतलब है? इसलिए अब यह कोई छिपी बात नहीं रह गई है कि राजस्थान का यह सियासी संकट मुख्यमंत्री पद को लेकर ज्यादा है।

राजस्थान में चल रहे सियासी संग्राम के बीच इस तरह के संकेत भी मिले कि कहीं इस प्रदेश में भी मध्यप्रदेश, कर्नाटक, गोवा जैसा खेल तो होने नहीं जा रहा। इन चचार्ओं और आशंकाओं को इसलिए भी बल मिला क्योंकि विपक्षी दल भाजपा ने खुल कर सचिन पायलट को लेकर सहानुभूति दिखाई है, पायलट के भाजपा में जाने की चचार्एं चलीं और भाजपा ने इस संकट को अवसर में बदलने के संकेत भी दिए।

राजनीतिक दलों को यह नहीं भूलना चाहिए कि उन्हें जनादेश जनता की सेवा के लिए मिलता है, न कि सरकारों को गिराने-बनाने के लिए। आखिरकार इसकी कीमत जनता को ही चुकानी पड़ती है। कहना न होगा कि राजस्थान में लंबे समय से चल रहे इस सियासी संकट के मूल में कांग्रेस पार्टी की दिनोंदिन खराब होती स्थिति भी है। पार्टी की स्थिति किसी से छिपी नहीं है। जो पार्टी लंबे समय से स्थायी अध्यक्ष नहीं तय कर पा रही हो, वह पार्टी के भीतर उठ रहे इस तरह के असंतोष से कैसे पार पाएगी, यह बड़ा सवाल है।

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