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संपादकीय: चीन का रुख

चीन सीमा क्षेत्र से सैनिकों की तादाद घटाने की बात तो हर बार करता रहा है, लेकिन इस दिशा में कोई ऐसा कदम नहीं बढ़ा रहा, जिससे गतिरोध खत्म करने को लेकर उसके प्रयासों में गंभीरता नजर आती हो। पर अब आठवें दौर की बातचीत का लब्बोलुआब यह बताया जा रहा है कि आने वाले दिनों में कुछ खास जगहों पर से दोनों देशों के सैनिक पीछे हट सकते हैं। अगर ऐसा होता है तो सीमा पर तनाव कम करने की दिशा में यह बड़ा कदम हो सकता है।

भारत-चीन सीमा पर तैनात भारतीय आर्मी। फाइल फोटो।

पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर सैनिकों का जमावड़ा खत्म करने के लिए भारत और चीन के बीच हुई आठवें दौर की बातचीत से जो संकेत मिले हैं, उनसे लग रहा है कि अब गतिरोध टूटना चाहिए और हालात सामान्य बनाने की दिशा में बढ़ना चाहिए। लेकिन चीन का अब तक जो रवैया रहा है, उसमें ज्यादा उम्मीद करना व्यर्थ ही है।

चीन सीमा क्षेत्र से सैनिकों की तादाद घटाने की बात तो हर बार करता रहा है, लेकिन इस दिशा में कोई ऐसा कदम नहीं बढ़ा रहा, जिससे गतिरोध खत्म करने को लेकर उसके प्रयासों में गंभीरता नजर आती हो। पर अब आठवें दौर की बातचीत का लब्बोलुआब यह बताया जा रहा है कि आने वाले दिनों में कुछ खास जगहों पर से दोनों देशों के सैनिक पीछे हट सकते हैं। अगर ऐसा होता है तो सीमा पर तनाव कम करने की दिशा में यह बड़ा कदम हो सकता है।

दोनों देशों के बीच इस साल मई में उस वक्त तनाव शुरू हुआ था जब पूर्वी लद्दाख में एलएसी के पास भारतीय क्षेत्र में चीनी सैनिक घुस आए थे। इसके बाद 15-16 जून की रात गलवान घाटी में चीनी सैनिकों ने भारतीय सैनिकों पर हमला कर दिया था और भारत के बीस जवान शहीद हो गए थे।

पिछले कुछ महीनों में भारत को लेकर चीन ने बहुत ही आक्रामक रुख अपनाया है। इससे क्षेत्रीय शांति को गंभीर खतरा पैदा हो गया है। विदेश मंत्री एस जयशंकर भी एलएसी पर हजारों की संख्या में चीनी सैनिकों की मौजूदगी को लेकर चिंता व्यक्त कर चुके हैं। जाहिर है, सीमा पर हालात गंभीर हैं। रक्षा मंत्री, थल और वायु सेना प्रमुखों और रक्षा सेवाओं के प्रमुख (सीडीएस) का लगातार लद्दाख सीमा का दौरा बता रहा है कि चीनी गतिविधियों को लेकर भारत सतर्क है और चीन के किसी भी हमले का जवाब देने के लिए पूरी तैयारी है।

एलएसी पर चीन ने सैनिकों के साथ-साथ भारी मात्रा में हथियार, टैंक आदि भी जमा कर लिए हैं। इससे साफ है कि वह किसी न किसी बहाने भारत को युद्ध के लिए उकसाना चाह रहा है। वरना क्यों तो वह गलवान घाटी में भारतीय सैनिकों पर हमला करता और क्यों फिर उसके बाद एलएसी पर हजारों की संख्या में सैनिकों को जमा करता। चीन की ये बढ़ती सैन्य गतिविधियां युद्ध की तैयारियों का स्पष्ट संकेत हैं।

भारत की स्थिति और रुख पहले से ही स्पष्ट है कि जब तक चीन पांच मई के पूर्व की स्थिति बहाल नहीं करता, तब तक गतिरोध खत्म नहीं होगा। आठ दौर की वार्ताओं के बावजूद पक्के तौर पर यह कह पाना मुश्किल है कि चीन जरा भी पीछे हटेगा, भले ही वह कुछ भी कहता रहे। अब बात कुछ खास जगहों पर से दोनों देशों के सैनिकों के पीछे हटने की हो रही है।

सवाल तो यह है जब भारतीय सैनिक अपने इलाके में हैं और घुसपैठ चीन के सैनिकों ने की है तो उसे ही अपने सैनिकों को पीछे हटाना चाहिए। सितंबर के पहले हफ्ते में रक्षा मंत्री ने मास्को में चीन के रक्षा मंत्री के साथ मुलाकात की थी और इसके तत्काल बाद दोनों देशों के विदेश मंत्री भी मास्को मिले थे और गतिरोध खत्म करने के लिए पांच सूत्री सहमति बनी थी, जिसमें जोर बातचीत के जरिए ही समाधान तक पहुंचने को लेकर रहा था।

लेकिन चीन जरा पीछे नहीं हटा, न ही इस सहमति को लेकर उसकी ओर से कोई सकारात्मक प्रतिक्रया देखने को मिली। वार्ताओं की सार्थकता तभी है जब चीन उस पर ईमानदारी से अमल करे। वरना दोनों देशों के बीच तनाव और बढ़ेगा ही।

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