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अराजकता की हिमायत

किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में आम नागरिक जब एक जनप्रतिनिधि को चुनते हैं तो इसका मतलब यह होता है कि वे उचित प्रक्रिया के तहत जनता के हितों का खयाल रखेंगे !

Giriraj singhसभा को संबोधित करते गिरिराज सिंह। फाइल फोटो।

किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में आम नागरिक जब एक जनप्रतिनिधि को चुनते हैं तो इसका मतलब यह होता है कि वे उचित प्रक्रिया के तहत जनता के हितों का खयाल रखेंगे, उसे सुनिश्चित करने की कोशिश करेंगे। लेकिन अगर व्यवस्था में कमियों को दूर करने का उचित उपाय न निकाल कर कोई जनप्रतिनिधि जनता को सरेआम अराजक होने की सलाह देने लगे तो यह देश के कानूनों के खिलाफ तो है ही, इससे उनकी योग्यता पर भी सवाल उठते हैं।

यह शिकायत सही हो सकती है कि सरकारी दफ्तरों में बैठे अफसर आम लोगों का काम करने में टालमटोल या कोताही करते हैं। लेकिन कानून और व्यवस्था के तहत इस समस्या को दूर करने के बजाय बिहार के बेगूसराय से भाजपा सांसद गिरिराज सिंह ने जनता को यह सलाह दी कि ‘अगर कोई अफसर बात नहीं सुने तो उसे बांस से पीटो’। सवाल है कि किसी सार्वजनिक मंच पर यह कहते हुए क्या उन्होंने यह नहीं सोचा कि एक जनप्रतिनिधि की इस सलाह पर अगर लोग अमल करने लगें तब फिर देश के संविधान और कानून की क्या जगह रह जाएगी और इसके बाद कैसे हालात पैदा हो सकते हैं?

देश में जो व्यवस्था और नौकरशाही काम कर रही है, उसके कामकाज में अगर कहीं गड़बड़ी है तो इसी में विधिसम्मत तरीके से प्रशासनिक सुधार के लिए जनता अपने जनप्रतिनिधियों को विधायिका में भेजती है। लेकिन अगर गिरिराज सिंह संवैधानिक और कानूनी तरीके से अफसरशाही के रवैये में बदलाव लाने के बजाय जनता को अराजक होने की सलाह देते हैं, तो कानून की रक्षा कौन करेगा? ऐसी अराजकता अपने आप में कानूनों के खिलाफ है।

मगर इससे ज्यादा हैरानी की बात और क्या होगी कि जिस व्यक्ति को बतौर जनप्रतिनिधि विधायिका में जाकर कानून बनाने और उसका सम्मान सुनिश्चित करने का दायित्व सौंपा गया है, वही लोगों के सामने व्यवस्थागत कानूनी प्रक्रिया को ताक पर रखने के लिए उकसावे से भरा बयान देता है। हालांकि इस तरह का विवादित बयान कोई पहली बार सामने नहीं आया है। ऐसे और भी नेताओं के बेलगाम बोल आते रहे हैं। विडंबना है कि न तो सरकार और न ही उनकी पार्टी ऐसे मौकों पर उन पर लगाम लगाने के लिए कुछ ठोस पहल करती है, ताकि दूसरे नेताओं को इसका सबक मिल सके।

यह छिपा नहीं है कि देश की जनता राजनीतिकों और व्यवस्था के आश्वासनों के बूते ही अब तक इस उम्मीद में इंतजार करती रही है कि सरकार लोगों की सुध लेगी। मगर सच यह है कि जनप्रतिनिधियों से लेकर नौकरशाही तक के जटिल संजाल में साधारण जनता की कोई खास अहमियत नहीं है। अमूमन हर चुनाव के पहले सभी पार्टियों के नेता जनता से बड़े-बड़े वादे करते हैं और चुनाव जीतने के बाद उसे भूल जाते हैं। दूसरी ओर, सरकारी दफ्तरों के तंत्र में बैठे अफसर और कर्मचारी लोगों के साथ कैसे पेश आते हैं, उनके काम को लेकर कैसा रवैया अपनाते हैं, यह भी जगजाहिर है।

व्यवस्था की जड़ों तक फैली इस लापरवाही और भ्रष्टाचार का इलाज क्या सिर्फ यह हो सकता है कि लोग अफसरों या नेताओं की पिटाई करने लगें? नेता अगर जनता के भरोसे की कसौटी पर खरे नहीं उतरते हैं तो अगले चुनाव में जनता उनकी नुमाइंदगी को खारिज कर सकती है और नए नुमाइंदे का चुन सकती है। जनप्रतिनिधियों का दायित्व है कि वे व्यवस्था में फैली गड़बड़ियों और अफसरों के भ्रष्ट या गलत तौर-तरीकों पर लगाम लगाने के लिए विधि और उचित प्रशासनिक प्रक्रिया के तहत कार्रवाई कराने का प्रयास करें। इसके बजाय अफसरों की मनमानी के खिलाफ जनता से अराजक और हिंसक होने की वकालत करने को किसी भी हाल में उचित नहीं ठहराया जा सकता है।

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