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अधूरी कवायद

सम-विषम योजना इस लिहाज से तो अच्छी ही कही जाएगी कि कुछ दिन दिल्ली की सड़कों पर वाहनों का दबाव कम रहेगा और यातायात जाम, ईंधन से निकलने वाले धुएं से तो राहत मिलेगी।

Author Published on: November 5, 2019 8:12 AM
सोमवार से एक बार फिर सम-विषम योजना लागू की गई है।

राजधानी दिल्ली में बढ़ते वायु प्रदूषण की समस्या से निपटने के लिए सोमवार से एक बार फिर सम-विषम योजना लागू की गई है। दिल्ली जिस तरह से ‘गैस चैंबर’ में तब्दील होती जा रही है, उसे देखते हुए इस तरह के बचाव संबंधी उपाय न केवल अपरिहार्य हो गए हैं, बल्कि इन्हें सख्ती से लागू करने की जरूरत है। इससे पहले 2016 में दो बार और 2017 में एक बार इस योजना को लागू किया था। सम-विषम योजना से भले बहुत ज्यादा असर न पड़ता हो, लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं कि अगर एक दिन छह लाख वाहन सड़क पर नहीं उतरते हैं तो इससे वायु प्रदूषण में कुछ तो कमी आएगी ही। पहले दो बार जब इस योजना को लागू किया था, उसके बाद इसके विरोधियों की ओर से कहा जाता रहा और कुछ पर्यावरण अध्ययनों में भी यह दावा किया गया कि सम-विषम योजना जैसी कवायदें वायु प्रदूषण रोकने में कामयाब नहीं होती हैं। सम-विषम योजना इस लिहाज से तो अच्छी ही कही जाएगी कि कुछ दिन दिल्ली की सड़कों पर वाहनों का दबाव कम रहेगा और यातायात जाम, र्इंधन से निकलने वाले धुएं से तो राहत मिलेगी।

यह सही है कि सिर पर मुसीबत पड़ने पर साल में एकाध बार अगर सम-विषम जैसी योजना लागू की जाती है तो इसका कोई बड़ा और दीर्घकालिक फायदा नहीं होने वाला। वातावरण तो रोजाना ही जहरीला हो रहा है। वाहनों से निकलने वाला धुआं तो दिल्ली जैसे महानगर के लिए रोजाना की समस्या है। ऐसे में एक पखवाड़े के लिए सम-विषम योजना लागू करके बहुत कुछ हासिल नहीं किया जा सकता। पर ऐसी योजना अगर व्यवस्थित रूप से और नियमित अंतराल पर लागू की जाए तो लंबे समय में इसके अच्छे नतीजे मिल सकते हैं। दिल्ली सिर्फ प्रदूषण की समस्या से नहीं जूझ रही है, बल्कि सड़कों पर अनवरत वाहनों का दबाव भी बड़ा संकट बनता जा रहा है। डेढ़-पौने दो करोड़ की आबादी वाले महानगरमें वाहनों की तादाद सवा करोड़ के आसपास है। सड़कों पर चलने के लिए जगह तक नहीं बचती। सुबह-शाम तो राजधानी में वाहन सिर्फ रेंगते हुए बढ़ते हैं। सम-विषम योजना इस समस्या से निपटने में मददगार हो सकती है। लेकिन इसके लिए सबसे बड़ी और पहली जरूरत जन भागीदारी की है, जिसका नितांत अभाव देखने को मिलता है। हैरानी और दुख की बात तो यह है कि जानते-बूझते भी लोगों ने सोमवार को विषम संख्या वाली गाड़ियां सड़कों पर उतारीं। हालांकि बड़ी संख्या में लोगों को चालान भरना पड़ा। लेकिन सवाल यह है कि अगर हम खुद ही जागरूक नहीं बनेंगे और नियम-कानूनों की धज्जियां उड़ाएंगे तो कैसे ऐसे अभियान सफल हो पाएंगे?

यह सही है कि सम-विषम योजना को लागू करने में कई खामियां हैं। मसलन, सीएनजी वाहनों पर भी इसे लागू कर देना। अगर ऐसा है तो डीटीसी की तो सारी बसें ही सीएनजी से चल रही हैं। क्या ये प्रदूषण नहीं फैलाएंगी? सम-विषम जैसी योजना तभी कारगर हो सकती है जब छूट संबंधी प्रावधानों को सीमित किया जाए। इसके अलावा सरकारी परिवहन व्यवस्था आज भी पर्याप्त नहीं है। मेट्रो का सफर महंगा है और आबादी की तुलना में उस पर भी जरूरत से ज्यादा दबाव है। दिल्ली में लाखों ऐसे वाहन सड़कों पर दौड़ रहे हैं जो अपनी दस-पंद्रह साल की अवधि पूरी कर चुके हैं, लेकिन सरकार इन पर लगाम लगा पाने की दिशा में नाकाम साबित हुई है। ऐसे में सम-विषम योजना को लागू करना तो ठीक है, लेकिन अभी तो इसे एक तरह से आधे-अधूरे प्रयास से ज्यादा कुछ नहीं कहा जा सकता।

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