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संपादकीयः आग्रह और दुराग्रह

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत के बयान की प्रतिक्रिया में एआइएमआइएम के नेता असदुद्दीन ओवैसी का यह कहना कि उनकी गर्दन पर कोई चाकू भी रख दे तो वे भारत माता की जय नहीं बोलेंगे, इसी सियासी खेल का हिस्सा है...

Author March 16, 2016 03:58 am

राष्ट्र के प्रति प्रेम की भावना प्रकट करना या न करना अब सियासी खेल बन गया लगता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत के बयान की प्रतिक्रिया में एआइएमआइएम के नेता असदुद्दीन ओवैसी का यह कहना कि उनकी गर्दन पर कोई चाकू भी रख दे तो वे भारत माता की जय नहीं बोलेंगे, इसी सियासी खेल का हिस्सा है। मोहन भागवत ने कुछ दिनों पहले कहा था कि युवा पीढ़ी को भारत माता की जय के नारे लगाना सिखाया जाना चाहिए। यह बात उन्होंने जनेवि में हुई घटना के बाद कही थी। छिपी बात नहीं है कि मोहन भागवत का बयान भी राजनीतिक मकसद से दिया गया। मगर उस पर ओवैसी ने जिस तल्खी से प्रतिक्रिया व्यक्त की, उसकी सराहना शायद ही कोई करे। अपने देश के प्रति प्रेम भावना रखने की उम्मीद हर नागरिक से की जाती है।

यह अलग बात है कि धार्मिक वजहों से कुछ नारे लगाना ओवैसी को मंजूर न हो, पर इस तरह प्रतिक्रिया देकर उन्हें देश के प्रति अपनी निष्ठा पर सवालिया निशान लगाने का मौका देने से बचना चाहिए। वे एक सियासी पार्टी से लोकसभा के सदस्य हैं, उनके देशप्रेम को लेकर तल्ख भावना प्रकट करने से स्वाभाविक ही विवाद उठा। राष्ट्रवाद पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कट्टर रवैए को लेकर अनेक लोगों को एतराज हो सकता है, पर उसका विरोध करने का यह तरीका नहीं हो सकता, जिस तरह ओवैसी कर रहे हैं।

उधर पाकिस्तान में एक अलग तरह का राष्ट्रवाद नजर आ रहा है। पाकिस्तान क्रिकेट टीम के कप्तान शाहिद अफरीदी ने कहा कि जैसा प्यार उन्हें भारत में मिला है, वैसा अपने देश में नहीं मिला। यह बात वहां के एक वकील को नागवार गुजरी और उन्होंने बाकायदा अफरीदी के खिलाफ देशद्रोह का मुकदमा दर्ज करा दिया। वकील का मानना है कि अफरीदी के बयान से पाकिस्तान की तौहीन हुई है। ऐसी संकीर्णताएं समाज को किस ओर ले जाएंगी, समझना मुश्किल है। कुछ साल पहले जब भारतीय क्रिकेट टीम पाकिस्तान दौरे पर गई थी, तब वहां के लोगों ने दिल खोल कर खिलाड़ियों पर प्यार लुटाया। वहां से लौट कर भारतीय खिलाड़ियों ने वहां मिले प्यार का खुल कर बखान किया। अगर वैसा ही अपनापन पाकिस्तानी खिलाड़ी भारत में महसूस करते हैं, तो यह गर्व का विषय होना चाहिए।

इसमें पाकिस्तान की तौहीन कैसे हो गई या फिर इससे पाकिस्तान के खिलाड़ियों में अपने देश के प्रति निष्ठा में कमी कहां से उजागर हो गई! देशप्रेम न तो धार्मिक नियम-कायदों के तहत सिखाया जा सकता है और न किसी दूसरे देश की तारीफ करने से वह कम हो जाता है। वह तो लोगों के मन में स्वत: बना रहता है। शायद ही कोई हो, जिसे अपने देश पर अभिमान न हो। इसके लिए किसी जाति या धर्म विशेष से जुड़ा होना जरूरी नहीं होता। देशप्रेम के प्रति संकीर्णता और कट््टर रवैया लोगों का मन कलुषित ही करता है, देशप्रेम को बढ़ावा नहीं देता। इसलिए चाहे वे मोहन भागवत हों, ओवैसा या फिर पाकिस्तान के कट््टर देशप्रेमी उन्हें राष्ट्रप्रेम की वकालत करने से पहले विचार अवश्य करना चाहिए कि कहीं उनके आग्रह या दुराग्रह के कारण समाज का कोई कोना आहत तो नहीं हो रहा, उसमें दरारें तो नहीं पड़ रहीं। अगर किसी के राष्ट्रप्रेम की वकालत या फिर विरोध के चलते समाज में फांक पैदा होती हो तो उसे शायद ही कोई स्वीकार करेगा

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