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एटमी चिंता

सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्यों में से एक, रूस के शामिल न होने से सम्मेलन की सफलता पर पहले ही सवालिया निशान लग गया था।

Author नई दिल्ली | April 4, 2016 02:05 am
वाशिंगटन में चौथा परमाणु सुरक्षा सम्मेलन आयोजित हुआ। (पीटीआई फोटो)

वाशिंगटन में चौथा परमाणु सुरक्षा सम्मेलन ऐसे वक्त हुआ जब परमाणु हथियार या तकनीक के गैर-जिम्मेदार हाथों में पड़ जाने का खतरा पहले से कहीं अधिक मंडरा रहा है। सम्मेलन में यह चिंता छाई रही। सम्मेलन शुरू होने के कुछ ही घंटों बाद खबर आई कि उत्तर कोरिया ने बैलिस्टिक मिसाइल का परीक्षण किया है। सम्मेलन की प्रासंगिकता को साबित करने के लिए यह घटना काफी थी। पर सवाल है, क्या इस सम्मेलन से परमाणु प्रसार का खतरा कम होने की उम्मीद जगी है? इसमें दो राय नहीं कि अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की पहल पर हुए इस सम्मेलन ने, जिसमें पचास देशों के नेताओं ने शिरकत की, परमाणु प्रसार के महाखतरे की तरफ दुनिया का ध्यान खींचा है। पर सम्मेलन कोई ठोस या बड़ी पहल करने में नाकाम रहा। कार्रवाई की रूपरेखा के बजाय जुबानी संदेश देने की कूटनीतिक कवायद अधिक हुई। सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्यों में से एक, रूस के शामिल न होने से सम्मेलन की सफलता पर पहले ही सवालिया निशान लग गया था। रूस इस बात से नाराज था कि उसे सम्मेलन का एजेंडा तय करने की प्रक्रिया से बाहर रखा जा रहा है। सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य होने के अलावा रूस की गैरहाजिरी इस कोण से भी ज्यादा खटकने वाली रही कि वह उत्तर कोरिया के साथ चली वार्ता प्रक्रिया का हिस्सा था। चीन के रवैए को भी चिंताजनक ही कहा जाएगा। सुरक्षा परिषद में जैश-ए-मंोहम्मद के सरगना मसूद अजहर को प्रतिबंधित करने का प्रस्ताव आया, तो चीन ने वीटो कर दिया। शायद वह जताना चाहता था कि भारत और पाकिस्तान के आपसी विवाद में वह नहीं पड़ना चाहता। पर मसूद अजहर क्या पाकिस्तान की नुमाइंदगी करता है? फिर चीन का ऐसा व्यवहार क्यों?

कोई कह सकता है कि परमाणु सुरक्षा सम्मेलन से इस मसले को जोड़ कर क्यों देखा जाए? पर यही तो सम्मेलन के पीछे मुख्य चिंता थी कि आज आतंकवाद से जुड़ा सबसे बड़ा खतरा परमाणु असुरक्षा का है। इसलिए आतंकवाद से सख्ती से निपटना सबकी प्राथमिकता होनी चाहिए। अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर सम्मेलन में आए सभी राष्ट्राध्यक्षों और नेताओं ने इस पर जोर दिया। यह किसी से छिपा नहीं है कि अलकायदा एटमी हथियार हासिल करना चाहता था। आईएस हासिल करने की फिराक में है। उसने रासायनिक हथियार तैनात कर रखे हैं। इस साल की शुरुआत में उत्तर कोरिया नेहाइड्रोजन बम का परीक्षण करने का दावा किया था। पाकिस्तान के परमाणु हथियार किसी दिन किसी आतंकी गुट के हाथ न लग जाएं, या कोई आतंकी गुट एटमी हथियार बनाने की सामग्री और तकनीक हासिल न कर ले, इसका अंदेशा रह-रह कर जताया जाता रहा है और सम्मेलन में भी यह आशंका छाई रही। कुछ समय पहले तक ईरान के परमाणु कार्यक्रम को रोक देने के लिए पश्चिमी देश प्रयासरत थे। ईरान में नेतृत्व परिवर्तन होने के बाद उन्हें इसमें सफलता मिल गई। पर जहां न कोई सरकार है न राजनीतिक नेतृत्व न जनमत का दबाव, बस दहशतगर्दी का पागलपन है, वहां सर्वनाश के खतरे से कैसे निपटा जाए। जाहिर है, आतंकवाद का खात्मा आज मानवता के बने रहने की शर्त है। पर परमाणु अप्रसार एक सीमित उद््देश्य है। इसके बजाय पूर्ण परमाणु निरस्त्रीकरण पर जोर दिया जाना चाहिए। सम्मेलन ने इसमें क्यों संकोच किया?

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