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एटमी अंदेशा

एक अध्ययन के मुताबिक पाकिस्तान परमाणु हथियार के लिहाज से दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी ताकत बनने की राह पर है।

Author October 24, 2015 10:48 AM

एक अध्ययन के मुताबिक पाकिस्तान परमाणु हथियार के लिहाज से दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी ताकत बनने की राह पर है। अगले दस साल में पाकिस्तान के एटमी हथियार जखीरे में दोगुना इजाफा होने के साथ ही उसके एटमी हथियारों की संख्या ढाई सौ तक पहुंच सकती है। यह खबर सारी दुनिया के लिए चिंताजनक है। भारत के लिए तो और भी, क्योंकि पाकिस्तान उसका पड़ोसी देश है।

इतना ही नहीं, पाकिस्तान की तरफ से परमाणु हथियार के इस्तेमाल को लेकर निहायत गैर-जिम्मेदाराना बयान जब-तब आते रहे हैं। मसलन, पिछले दिनों पाकिस्तान के विदेश सचिव एजाज चौधरी ने कहा कि उनके देश ने ‘भारत के संभावित हमले को रोकने’ के लिए कम क्षमता के सामरिक परमाणु हथियारों का विकास किया है। यह भी गौरतलब है कि एजाज ने यह बात वाशिंगटन में कही। इस तरह के और भी बयान याद किए जा सकते हैं।

परमाणु हथियारों के पक्ष में एक दलील यह दी जाती है कि वे ‘युद्ध प्रतिरोधक’ का काम करते हैं, यानी अगर किसी देश के पास एटमी हथियार मौजूद हो, तो कोई उस पर हमला करने की हिम्मत नहीं करेगा। लेकिन एटमी हथियारों की मौजूदगी ही दुनिया के लिए एक बड़ा खतरा है। उनकी सुरक्षा एक बहुत जिम्मेदारी भरा काम है। अगर पाकिस्तान को लेकर अक्सर अंदेशा जाहिर किया जाता है तो इसीलिए कि वहां निर्वाचित राजनीतिक नेतृत्व कमजोर है। सुरक्षा संबंधी सारे फैसले सेना ही करती है। फिर, वहां कई तरह के कट््टरपंथी संगठन सक्रिय हैं और सेना के भीतर भी वे सेंध लगाते रहते हैं। आतंकवादी गुट जाने कब से ताक में हैं कि एटमी हथियार उनके हाथ लग जाए। अगर ऐसा कभी हुआ तो वह दुनिया के लिए बहुत ही भयावह होगा।

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एटमी हथियारों की तरह रासायनिक हथियार भी मानवता के लिए खतरा हैं। भारत के सांसद अभिजीत बनर्जी ने गुरुवार को संयुक्त राष्ट्र महासभा की ‘फर्स्ट कमेटी’ में सामूहिक विनाश के हथियारों पर बहस के दौरान रासायनिक हथियारों के उपयोग के खिलाफ भारत की प्रतिबद्धता का इजहार किया। यों भारत के पास परमाणु हथियार हैं, पर वह परमाणु निरस्त्रीकरण का हिमायती रहा है। समस्या यह है कि इस बारे में बड़ी शक्तियों की दोरंगी नीति रही है।

यही कारण है कि एनपीटी यानी परमाणु अप्रसार संधि कारगर साबित नहीं हो पाई है। इस संधि पर 1968 में हस्ताक्षर होने शुरू हुए और इसके दो साल बाद यह लागू की गई। यों यह एक ऐसी सामरिक संधि है जिस पर सबसे ज्यादा देशों ने हस्ताक्षर किए हैं, पर यह विषमता पर टिकी हुई है। इस संधि ने अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस और चीन को परमाणु-शक्ति का दर्जा दे रखा है, जो संयुक्त राष्ट्र के स्थायी सदस्य भी हैं। इनके पास मौजूद एटमी हथियारों की सम्मिलित संख्या हजारों में होगी।

संधि की निगाह में इनके पास परमाणु हथियार होना आपत्तिजनक नहीं है, और दूसरी तरफ यह संधि बाकी दुनिया से परमाणु अप्रसार की उम्मीद करती है। भेदभावपूर्ण होने के कारण ही भारत ने इस संधि पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं। एनपीटी के तहत विशेष दर्जा पाए देश इस संधि पर हस्ताक्षर करने को ही दुनिया को एटमी खतरे से बचाने की कवायद के रूप में देखते हैं। जबकि जरूरत परमाणु निरस्त्रीकरण की है।

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