सरकार के तमाम दावों के बावजूद विभिन्न स्तर की परीक्षाओं में गड़बड़ी का सिलसिला थम नहीं रहा है। राष्ट्रीय पात्रता-सह-प्रवेश परीक्षा (नीट) के प्रश्नपत्र लीक के बाद अब यूजीसी-नेट में तीन विषयों की परीक्षा रद्द कर दी गई, जिसे दोबारा से आयोजित किया जाएगा। राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (एनटीए) का कहना है कि इन विषयों के प्रश्नपत्रों में त्रुटियां रह जाने के कारण दोबारा से परीक्षा कराने का फैसला किया गया है।

इससे साफ है कि परीक्षाओं को बिना किसी गड़बड़ी के कराने की प्रतिबद्धता धरातल पर नजर नहीं आ रही है। यही वजह है कि बुधवार को सर्वोच्च न्यायालय को भी यह कहना पड़ा कि प्रवेश परीक्षाओं के आयोजन में सुधारों को संस्थागत रूप दिया जाना चाहिए और इनका सुचारु संचालन सुनिश्चित करने के लिए तकनीकी बदलाव किए जाने की जरूरत है। साथ ही अदालत ने एनटीए से राधाकृष्णन समिति और नंदन नीलेकणि समिति की सिफारिशों को लागू करने के लिए उठाए गए कदमों की जानकारी भी मांगी है।

दूसरी ओर, सरकार की ओर से अदालत में एक हैरान करने वाला दावा किया गया कि नीट के लिए लागू की गई व्यवस्था पूरी तरह सुरक्षित है और इसमें सेंध नहीं लगाई जा सकती। मगर सवाल है कि अगर परीक्षा व्यवस्था इतनी ही चाक-चौबंद थी, तो नीट के प्रश्नपत्र कैसे लीक हो गए? अगर प्रश्नपत्र तैयार करने से लेकर उसे परीक्षा केंद्र तक पहुंचाने में सुरक्षा मानदंडों पर अमल करने के लिए पूरी सतर्कता बरती गई, तो फिर प्रश्नपत्र गलत हाथों में कैसे पहुंच गए?

इससे पहले वर्ष 2024 में नीट के नतीजे पर विवाद हुआ था। एनटीए के तौर-तरीके पर बार-बार सवाल उठने के बाद भी प्रवेश परीक्षाओं के आयोजन में जमीनी स्तर पर सुधार क्यों नहीं हो रहा है? कायदे से ऐसी स्थिति से निपटने के लिए कानून में विशेष प्रावधान होने चाहिए, जिसमें प्रश्नपत्र तैयार करने वाले, जांच करने वाले या अन्य अधिकृत लोग अपनी पहुंच का गलत इस्तेमाल कर सामग्री को किसी अनधिकृत व्यक्ति को उपलब्ध न करा सकें।

जब किसी व्यक्ति को अत्यंत महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी गई हो और वह भरोसे का दुरुपयोग करता है, तो उसे गंभीर अपराध मानकर कड़ी सजा का प्रावधान होना चाहिए।