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संपादकीयः सुनवाई के सहारे

जिस वक्त समूचे देश में गाय से जुड़ी भावनाएं एक संवेदनशील मुद्दा बन चुकी हैं, राजस्थान हाइकोर्ट के एक न्यायाधीश का यह सुझाव सुर्खियां बन गया कि गाय को राष्ट्रीय पशु का दर्जा दिया जाए।

गाय को राष्ट्रीय पशु का दर्जा दिया जाए।

जिस वक्त समूचे देश में गाय से जुड़ी भावनाएं एक संवेदनशील मुद्दा बन चुकी हैं, राजस्थान हाइकोर्ट के एक न्यायाधीश का यह सुझाव सुर्खियां बन गया कि गाय को राष्ट्रीय पशु का दर्जा दिया जाए। सवाल है कि अगर किसी गोशाला में लापरवाही की वजह से सैकड़ों गायों की मौत हो गई, तो क्या इस समस्या का हल गाय को राष्ट्रीय पशु की मान्यता देना है! गौरतलब है कि राजस्थान की हिंगोनिया गोशाला को लेकर दायर एक याचिका की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति महेश चंद्र शर्मा ने गोहत्या के लिए आजीवन कारावास का प्रावधान किए जाने के साथ-साथ गाय को राष्ट्रीय पशु का दर्जा देने के लिए जल्द कदम उठाने का सुझाव पेश किया। सेवानिवृत्ति के आखिरी दिन के अपने अंतिम फैसले में पेश सुझाव को लेकर सवाल उठाए जाने पर उन्होंने कहा कि उनकी टिप्पणी अनुशंसात्मक हैं, न कि बाध्यकारी। हैरानी की बात यह है कि उन्होंने एक निराधार और सुनी-सुनाई कहानी को अपने पक्ष में तर्क की तरह पेश किया कि मोर के आंसू से मोरनी गर्भधारण करती है, मोर ‘ब्रह्मचारी’ और ‘पवित्र’ है, इसीलिए उसे राष्ट्रीय पक्षी बनाया गया; इसी तरह गाय में भी दिव्य गुण हैं। स्वाभाविक ही उनकी यह दलील मखौल का विषय बन गई।

गाय के नाम पर उठे विवाद और हिंसा की घटनाओं से जज महोदय अनजान नहीं रहे होंगे। वैसे में ‘आत्मा की आवाज’ का हवाला देकर ऐसी राय जाहिर करना कितना उचित है! फिर आत्मा की आवाज दूसरों की भी तो हो सकती है! एक जज को हमेशा कानून और संविधान का खयाल कर अपनी बात कहनी चाहिए। लेकिन अपने कार्यकाल के अंतिम दिन संवैधानिक दायरे से परे जाकर टिप्पणी करना आत्मा की आवाज हो न हो, मौके का फायदा उठाने की मंशा की तरफ जरूर संकेत करता है। भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है और यहां अलग-अलग धार्मिक मान्यताओं के लोग अपनी आस्थाओं के साथ सहजता से जीते हैं। लेकिन कुछ समय से इसमें बहुसंख्यक समुदाय की मान्यताओं को बाकी सबके लिए अनिवार्य बनाने या थोपे जाने की जो कोशिश शुरू हुई है, उसने व्यापक स्तर पर आपसी सौहार्द को नुकसान पहुंचाया है। गाय के नाम पर फैलाए जा रहे उन्माद की वजह से कई मौकों पर भीड़ बर्बरता की हद तक चली गई, जिसके फलस्वरूप कुछ लोगों को जान से हाथ धोना पड़ा।

हाल में केंद्र सरकार ने पशु बाजार के नियमन के नाम पर नए नियम जारी किए, जिन पर काफी विवाद चल रहा है। मद्रास हाइकोर्ट ने जिस तरह केंद्र सरकार की इस अधिसूचना पर रोक लगा दी और केरल हाइकोर्ट ने इस मसले पर केंद्र के नए नियमों में दखल देने से मना कर दिया, उससे भी जाहिर है कि इस मुद््दे पर देश के अलग-अलग हिस्सों में काफी मतभिन्नता है। मद्रास हाइकोर्ट की यह टिप्पणी अहम है कि लोगों की भोजन-संस्कृति और खाने-पीने की आदतें तय करना सरकार का काम नहीं है; अपनी पसंद का खाना चुनना सभी का व्यक्तिगत मामला है और इस अधिकार में कोई दखल नहीं दे सकता। वहीं केरल, पश्चिम बंगाल, तेलंगाना और मिजोरम जैसे राज्यों ने केंद्र से नई नियमावली वापस लेने की मांग की है। लेकिन क्या केंद्र को यह अहसास नहीं रहा होगा कि इस तरह की प्रतिक्रियाएं होंगी। फिर नए नियम, राज्यों की राय लिए बगैर क्यों जारी कर दिए गए, जबकि भाजपा विपक्ष में रहने के दौरान संघीय भावना की दुहाई देते नहीं थकती थी!

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