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संपादकीयः आस्था की नींव

राम जन्मभूमि विवाद का निपटारा न हो पाने के पीछे राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी भी बड़ा कारण थी। हालांकि केंद्र में कांग्रेस की सरकार ने राम मंदिर का ताला खोलने और उसमें पूजा-पाठ शुरू करने की इजाजत दे दी थी, पर मंदिर की भूमि से जुड़ा मामला अदालतों में अटका हुआ था।

अब लोगों की प्रतीक्षा शुरू हो गई है, जब भव्य राम मंदिर में रामलला विराजमान होंगे।

आखिरकार राम मंदिर का शिलान्यास हो गया। अब लोगों की प्रतीक्षा शुरू हो गई है, जब भव्य राम मंदिर में रामलला विराजमान होंगे। प्रधानमंत्री के शिलान्यास करने के बाद अब मंदिर निर्माण की प्रक्रिया शुरू हो सकेगी। यों मंदिर का विवादित ढांचा ढहाए जाने के बाद से ही मंदिर निर्माण के लिए शिलाओं को तराशने वगैरह का काम लगातार चल रहा था, इसलिए मंदिर निर्माण में बहुत वक्त नहीं लगना चाहिए। सबसे बड़ी बात है कि अब राम मंदिर जन्मभूमि से जुड़ा विवाद सदा के लिए समाप्त हो गया है। भगवान राम हिंदू आस्था से जुड़े हैं, इसलिए उनकी जन्मभूमि संबंधी विवाद के निपटारे और मंदिर निर्माण की प्रक्रिया शुरू होने की आस पूरी दुनिया के हिंदू समुदाय को थी। मगर कुछ राजनीतिक स्वार्थों के चलते यह विवाद लंबा खिंचता रहा। राम मंदिर परिसर में बाबरी मस्जिद का ढांचा भी मौजूद था, जिसे लेकर सुन्नी वक्फ बोर्ड और कुछ अन्य मुसलिम संगठनों ने मंदिर निर्माण की प्रक्रिया को अदालत में चुनौती दी थी। राम जन्मभूमि को लेकर विभिन्न अदालतों में दावे दायर किए गए थे, जिन पर सुनवाई करना और फिर सबको एक साथ जोड़ कर अंतिम निर्णय पर पहुंचना पेचीदा काम था। इसलिए सारे मुकदमों को एक साथ नत्थी कर सुनवाई शुरू हुई और फिर विभिन्न वर्गों के लोगों, बुद्धिजीवियों, इतिहासकारों आदि के बयान दर्ज करने के बाद राम जन्मभूमि संबंधी दावों को लेकर अंतिम निर्णय पर पहुंचा जा सका।

राम जन्मभूमि विवाद का निपटारा न हो पाने के पीछे राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी भी बड़ा कारण थी। हालांकि केंद्र में कांग्रेस की सरकार ने राम मंदिर का ताला खोलने और उसमें पूजा-पाठ शुरू करने की इजाजत दे दी थी, पर मंदिर की भूमि से जुड़ा मामला अदालतों में अटका हुआ था। फिर भाजपा ने राम मंदिर निर्माण को अपने घोषणापत्र में शामिल किया और देश भर में शिलापूजन का कार्यक्रम चलाया। इसी अभियान के तहत विवादित ढांचे को कारसेवकों ने गिरा दिया। उसके बाद करीब अठाईस साल तक राम जन्मभूमि की जमीन पर मालिकाना हक और विवादित ढांचा गिराए जाने के मुकदमे अलग-अलग चलते रहे। भाजपा के प्रतिद्वंद्वी राजनीतिक दल विवादित ढांचे के गिराए जाने को सांप्रदायिक सौहार्द के लिए खतरा बताते रहे। कुछ मुसलिम संगठन भी इस तुष्टीकरण की राजनीति को बढ़ाने में सहयोग करते रहे। इस तरह राम जन्मभूमि विवाद आस्था के बजाय दलगत स्वार्थों में उलझ कर रह गया था। अच्छी बात है कि इस पर सर्वोच्च न्यायालय ने पिछले साल रोजाना सुनवाई कर, सभी पक्षों की बातें सुनने के बाद सुसंगत और सर्वमान्य फैसला सुनाया कि राम मंदिर का निर्माण उसी भूमि पर होना चाहिए और दूसरे पक्षों- सुन्नी वक्फ बोर्ड और निर्मोही अखाड़ा- को उनके हिस्से के बराबर जमीन कहीं और उपलब्ध कराई जानी चाहिए।

हालांकि केंद्र की भाजपा सरकार पर लगातार जन-आस्था का दबाव बनता रहा कि वह अदालत से बाहर हस्तक्षेप करे और मंदिर निर्माण की प्रक्रिया शुरू कराए। पर केंद्र सरकार ने हमेशा अदालत के फैसले का इंतजार किया और आखिरकार फैसला जन-आस्था के पक्ष में आया। यों मंदिर के पक्ष में मुसलिम समुदाय का भी एक बड़ा वर्ग था। वह चाहता था कि चूंकि भगवान राम हिंदू आस्था से जुड़े हैं, इसलिए उनका मंदिर वहीं बनना चाहिए, जहां उनकी जन्मभूमि मानी जाती है। इसलिए मंदिर निर्माण को लेकर किसी तरह के अड़चन की गुंजाइश पहले ही समाप्त हो गई थी। आस्था के प्रतीक राम मंदिर के निर्माण से स्वाभाविक ही चौतरफा प्रसन्नता की लहर है।

 

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