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दमन का रास्ता

म्यांमा में सेना के शासन का अध्याय कोई नया नहीं है। वहां लोगों ने पहले भी सेना के राज की सख्ती और दमन देखे हैं।

aang saang sukiसांकेतिक फोटो।

म्यांमा में सेना के शासन का अध्याय कोई नया नहीं है। वहां लोगों ने पहले भी सेना के राज की सख्ती और दमन देखे हैं। लेकिन इस बार एक महीने पहले हुए सैन्य तख्तापलट के खिलाफ वहां के नागरिक जिस तरह सड़कों पर उतर आए है, उससे साफ है कि इतिहास के वे दमन लोगों को अब स्वीकार नहीं हैं।

हालांकि वहां की सेना बिल्कुल अपने चरित्र को सही साबित करते हुए दमन और बर्बरता पर उतर चुकी है। यों इस बार तख्तापलट के कुछ दिनों बाद से वहां की जनता सड़कों पर उतर कर इस मांग के साथ विरोध प्रदर्शन कर रही है कि सेना सत्ता छोड़े और लोकतंत्र की बहाली हो। लेकिन सेना के रवैये का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि रविवार को जब भारी पैमाने पर लोगों ने सैन्य तख्तापलट के खिलाफ प्रदर्शन आयोजित किया तो पुलिस ने कई जगहों पर बिना किसी चेतावनी के गोलीबारी शुरू कर दी, जिसमें करीब बीस लोगों की जान चली गई। इसके अलावा, म्यांमा की राजधानी यंगून में विरोध प्रदर्शन में शामिल बहुत सारे विद्यार्थियों और शिक्षकों को भी गिरफ्तार कर लिया गया।

आमतौर पर सैन्य तख्तापलट के जरिए सत्ता में आया कोई भी शासन आम जनता के खिलाफ ऐसा ही बर्बर रुख अख्तियार करता है। बिना किसी जिम्मेदारी और जवाबदेही के इस तरह के दमन के पीछे एक बड़ा कारण यह भी होता है कि ऐसी सत्ता के पीछे जनता का समर्थन नहीं होता है। इसलिए ऐसी सत्ताएं जनता के सुख-दुख या किसी भी तरह के लोकतांत्रिक अधिकारों का खयाल करना जरूरी नहीं समझती हैं, बल्कि अपने खिलाफ होने वाले प्रदर्शनों में वह दमन और बर्बरता के ज्यादा सख्त तरीके इसलिए भी इस्तेमाल करती हैं, ताकि जनता के बाकी हिस्से में इसका संदेश जाए और लोग इससे दूर रहें।

लेकिन दुनिया का इतिहास बताता है कि किसी भी देश में तानाशाही राज का दौर बहुत लंबा नहीं चलता है और वस्तुस्थिति को समझने के बाद आखिर जनता का धीरज छूटता है। इस लिहाज से देखें तो म्यांमा में भी इस बार जनता ने सैन्य तख्तापलट के बाद सेना के राज को चुपचाप कबूल करने से इनकार कर दिया है और फिर से लोकतांत्रिक शासन को बहाल करने की मांग के साथ लाखों नागरिक सड़कों पर उतर गए हैं। सेना की समस्या अब यह है कि दमन के बावजूद लोगों का विरोध अब देश के अलग-अलग हिस्सों में फैल रहा है।

संयुक्त राष्ट्र से लेकर तमाम अंतरराष्ट्रीय मंचों से म्यांमा की सेना के ऐसे बर्ताव पर तीखे सवाल उठे हैं और प्रतिबंध लगाने तक की बात भी की गई है। लेकिन सवाल है कि क्या म्यांमा की सेना पर वहां के नागरिकों के आंदोलित होने का कोई फर्क पड़ेगा! दरअसल, 1960 के दशक से ही सैन्य तानाशाही का दंश झेल रहे म्यांमा में लोकतंत्र की बातें बहुत पुरानी नहीं हैं। महज आठ साल पहले प्रशासनिक सुधार और लोकतंत्र की हवा चली, तब 2012 के उपचुनावों में नोबेल शांति पुरस्कार विजेता आंग सान सू की और उनकी पार्टी को अच्छा समर्थन मिला।

उसके बाद वहां सू की के साथ लोकतंत्र के सपने भी फलने-फूलने लगे। हालांकि इस बीच रोहिंग्या मुसलमानों के साथ वहां की सत्ता ने जो बर्ताव किया, उससे यह सवाल भी उठा कि लोकतंत्र के सपने के साथ जो पार्टी खड़ी हुई, वह वहां के एक समुदाय के साथ व्यापक पैमाने पर होने वाली हिंसा पर कैसे कोई स्पष्ट रुख अख्तियार नहीं कर पाई! अब देखना यह है कि म्यांमा में बड़ी मुश्किल से हासिल किए गए लोकतंत्र को वहां के लोग कैसे बचा पाते हैं और इसमें अंतरराष्ट्रीय समुदाय की क्या भूमिका होती है।

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