देश में हर नागरिक को शांतिपूर्ण तरीके से विरोध प्रदर्शन करने का अधिकार है। यह अपनी मांगों को प्रभावी ढंग से शासन-प्रशासन के समक्ष रखने का एक तरीका हो सकता है। मगर उत्तर प्रदेश के नोएडा में सोमवार को अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर उतरे श्रमिकों का प्रदर्शन जिस तरह हिंसा और आगजनी में तब्दील हो गया, वह वास्तव में चिंताजनक है। कई इलाकों में यातायात ठप हो गया, वाहनों में तोड़फोड़ कर उन्हें आग के हवाले कर दिया गया और कुछ जगह पुलिस से झड़प के दौरान पत्थरबाजी भी गई।
अराजकता की राह निश्चित रूप से लोकतंत्र में बाधक है, लेकिन सवाल है कि यह स्थिति क्यों और कैसे उत्पन्न हुई तथा इसके लिए कौन जिम्मेदार है। सरकार और जिला प्रशासन की ओर से समय रहते श्रमिकों को भरोसे में लेकर समाधान खोजने के कारगर प्रयास क्यों नहीं किए गए?
गौरतलब है कि गौतम बुद्ध नगर जिले के विभिन्न औद्योगिक क्षेत्रों में श्रमिक बीते चार दिन से धरना-प्रदर्शन कर रहे थे। उनकी प्रमुख मांगों में न्यूनतम वेतन की गारंटी, समय पर पूरा वेतन, अतिरिक्त समय में काम करने पर दोगुना भुगतान तथा असंगठित एवं घरों पर सामान पहुंचाने वाले श्रमिकों को भी सामाजिक एवं रोजगार सुरक्षा के दायरे में लाना शामिल हैं।
महंगाई ने भरण-पोषण मुश्किल किया
खबरों के मुताबिक, प्रदेश सरकार की ओर से इनमें से कुछ मांगों को लेकर सहमति व्यक्त की गई थी, लेकिन प्रदर्शनकारी श्रमिक इससे संतुष्ट नहीं थे। इसमें दोराय नहीं है कि आए दिन महंगाई जिस तरह से बढ़ रही है, उससे श्रमिक वर्ग के लिए परिवार का भरण-पोषण करना मुश्किल होता जा रहा है। ऐसे में कम वेतन और उसका भी समय पर भुगतान न होने से उनकी दिक्कतें और बढ़ जाती हैं।
सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि श्रमिकों को न्यूनतम वेतन के भुगतान की व्यवस्था पूरी तरह लागू की जाए। साथ ही वक्त के साथ बढ़ती महंगाई के मद्देनजर कामगारों की बुनियादी जरूरतें और गरिमा के साथ जीने का अधिकार बाधित न हों। कारखानों के प्रबंधनों का भी यह दायित्व है कि वे श्रमिकों की वेतन वृद्धि समेत अन्य मांगों पर विचार करें और आपसी सहमति से समस्याओं को सुलझाने की दिशा में काम करे।
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2 फरवरी को बिहार के औद्योगिक शहर बरौनी से विरोध प्रदर्शनों की शुरुआत हुई और इसके बाद कम से कम कर्मचारियों द्वारा पांच जगहों पर विरोध प्रदर्शन किए गए। पूरी खबर पढ़ने के लिए क्लिक करें।
