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संपादकीयः समता का सम्मान

पूरी दुनिया में घरों से लेकर कार्यस्थलों तक और संघर्षों तथा गृहयुद्ध की मार झेल रहे देशों में यौन उत्पीड़न को एक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है।

Author October 8, 2018 3:46 AM
इस बार शांति का नोबेल पुरस्कार यौन उत्पीड़न के खिलाफ अभियान चलाने वाले दो महानायकों कांगो के स्त्री रोग चिकित्सक डेनिस मुकवेगे और इराकी मूल की युवती नादिया मुराद को दिया गया है।

इस बार शांति का नोबेल पुरस्कार यौन उत्पीड़न के खिलाफ अभियान चलाने वाले दो महानायकों कांगो के स्त्री रोग चिकित्सक डेनिस मुकवेगे और इराकी मूल की युवती नादिया मुराद को दिया गया है। डॉ. मुकवेगे पिछले दो दशक से भी ज्यादा समय से यौन उत्पीड़न की शिकार महिलाओं का इलाज करते हैं और दुनिया भर में इस बुराई के खिलाफ लोगों को जागरूक बनाने के लिए अभियान चला रहे हैं। नादिया मुराद ने अपने छोटे से जीवन में यौन दासी बनने जैसी पीड़ा भोगी, लेकिन इसी पीड़ा को उन्होंने दुनिया भर में महिलाओं के साथ होने वाले इस अमानवीय अपराध के खिलाफ खड़े होने की ताकत में बदल डाला। आज नादिया एक संगठन चला कर यौन दासता के खिलाफ काम कर रही हैं। नोबेल पुरस्कार चयन समिति का यह फैसला जहां पूरी दुनिया के समाजों और सरकारों के लिए बड़ा सदेश है, वहीं इस मार को झेल रही आबादी के लिए उम्मीद की एक किरण भी पैदा करता है।

पूरी दुनिया में घरों से लेकर कार्यस्थलों तक और संघर्षों तथा गृहयुद्ध की मार झेल रहे देशों में यौन उत्पीड़न को एक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। दुनिया के संकटग्रस्त हिस्सों में न सिर्फ महिलाओं, बल्कि अबोध बच्चियों तक को यौन हिंसा का शिकार होना पड़ रहा है। संयुक्त राष्ट्र शांति सैनिकों पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगते रहे हैं। वर्ष 2012 में जब डॉ. मुकवेगे को यौन हिंसा पर संयुक्त राष्ट्र में बोलने के लिए आमंत्रित किया गया था तो उन्होंने इस जघन्य अपराध के लिए जिम्मेदार लोगों की कड़ी आलोचना की थी। इस वजह से उन पर उनके ही देश कांगो में कई बार हमले भी हुए। लेकिन वे लगातार यौन उत्पीड़न की शिकार महिलाओं के लिए काम करते रहे। इसीलिए आज कांगों ही नहीं, दूसरे अफ्रीकी देशों में भी महिलाएं उनमें ईश्वर का रूप में देखती हैं। नादिया मुराद ने भी गजब की हिम्मत दिखाई। यौन उत्पीड़न के खिलाफ लड़ाई का जो जज्बा इस युवती में दिखा, वह दुनिया की करोड़ों महिलाओं को ऐसे जुल्म के खिलाफ खड़े होने की ताकत देता है।

यौन उत्पीड़न सदियों से गंभीर समस्या बनी हुई है। इक्कीसवीं सदी में जब इन्सान बहुत ज्ञानी और सभ्य होने का दावा कर रहा है, तब भी आधी आबादी को इस समस्या से निजात नहीं मिली है। अब यौन उत्पीड़न के मामले जिस तेजी से सामने से आ रहे हैं, उससे इस समस्या की विकरालता का पता चलता है। विकसित, विकासशील और तीसरी दुनिया के देशों में सब जगह यौन उत्पीड़न सरकार और समाज के लिए गंभीर चुनौती के रूप में खड़ा है। दुनिया भर में महिलाओं को कभी न कभी और किस तरह यौन उत्पीड़न का शिकार होना पड़ा है, यह मीटू अभियान से पता चलता है। तमाम बड़ी हस्तियों ने साहस जुटाते हुए इस बात का खुलासा किया कि उनको भी इस दर्दनाक यातना से गुजरना पड़ा। तमाम देश यौन उत्पीड़न की घटनाओं से निपटने के लिए कानूनी तरीकों से लेकर दूसरे तरीके अपना रहे हैं, पर इसके सकारात्मक नतीजे सामने नहीं आ रहे। यही गंभीर चिंता का विषय है। अगर दुनिया को सही मायनों में समृद्ध बनाना है तो सबसे पहले महिलाओं को सशक्त बनाना होगा। इसके लिए जरूरी है उन्हें यौन उत्पीड़न जैसी यातना से मुक्ति दिलाना। इसके लिए महिलाओं के प्रति नजरिया और सोच बदलना होगा। डॉ. मुकवेगे और नादिया मुराद ने इसी का रास्ता दिखाया है।

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