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संपादकीय: बंदी के बाद

अब भी तेरह शहरों और तीस नगरपालिका क्षेत्रों में स्थिति गंभीर बनी हुई है। इसी के मद्देनजर बंदी खोलने के पहले चरण की शुरुआत हो चुकी है। पूर्णबंदी के पहले चरण की समाप्ति के बाद से ही दबाव बनने शुरू हो गए थे कि कड़ी शर्तों के साथ कल-कारखानों, व्यावसायिक गतिविधियों को खोलने की इजाजत मिलनी चाहिए, नहीं तो अर्थव्यवस्था बिल्कुल ध्वस्त हो जाएगी।

Author Published on: June 1, 2020 1:31 AM
Lockdown in india 850प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 24 मार्च की रात 12 बजे (25 मार्च) से लॉकडाउन का ऐलान किया था।

चार चरण की बंदी के बावजूद कोरोना संक्रमण को रोकने संबंधी चुनौतियां बनी हुई हैं। बल्कि बढ़ी ही हैं। हर रोज संक्रमितों की संख्या कुछ बढ़ी हुई दर्ज हो रही है। हालांकि स्वस्थ होने वालों का आंकड़ा भी लगातार बढ़ रहा है, पर संक्रमण की गति को रोक पाना फिलहाल कठिन जान पड़ता है। चूंकि इससे पार पाने की जिम्मेदारी मुख्य रूप से राज्य सरकारों पर है, इसलिए जहां संक्रमण रुक नहीं पा रहा, वे स्वाभाविक ही बंदी को हटाने के पक्ष में नहीं थीं।

अब भी तेरह शहरों और तीस नगरपालिका क्षेत्रों में स्थिति गंभीर बनी हुई है। इसी के मद्देनजर बंदी खोलने के पहले चरण की शुरुआत हो चुकी है। पूर्णबंदी के पहले चरण की समाप्ति के बाद से ही दबाव बनने शुरू हो गए थे कि कड़ी शर्तों के साथ कल-कारखानों, व्यावसायिक गतिविधियों को खोलने की इजाजत मिलनी चाहिए, नहीं तो अर्थव्यवस्था बिल्कुल ध्वस्त हो जाएगी। इसलिए तीसरे चरण में कुछ गतिविधियों को खोल दिया गया। चौथे चरण में ज्यादातर कारोबार, मुहल्लों की छोटी-मोटी दुकानें तक खुलनी शुरू हो गई। सड़कों पर आवाजाही तेज हो गई। कुछ रेलें और घरेलू उड़ानें भी शुरू कर दी गईं। जो श्रमिक अपने घर लौटना चाहते थे, उन्हें जाने का प्रबंध किया गया। पर जैसे-जैसे ये गतिविधियां बढ़ीं, वैसे-वैसे चुनौतियां भी बढ़ती नजर आई।

यह ठीक है कि आर्थिक गतिविधियों को लंबे समय तक रोक कर नहीं रखा जा सकता। उन्हें खोलने की मांग स्वाभाविक थी। पर तमाम विशेषज्ञ जिस तरह दुनिया के कई दूसरे देशों का उदाहरण देते हुए कहते रहे हैं कि बगैर बंदी लागू किए भी कोरोना संक्रमण को रोकने के प्रयास किए जा सकते हैं, उसके भारत जैसे देश में कितना सफल हो सकने की उम्मीद की जा सकती है। जिन देशों ने बंदी का रास्ता नहीं अपनाया या बहुत कम समय के लिए लागू किया वहां की आबादी और स्वास्थ्य सुविधाओं से भारत की तुलना नहीं की जा सकती। फिर इसमें जनजागरूकता भी एक बड़ा पहलू है।

हमारे यहां मामूली छूट मिलते ही लोग जिस तरह सुरक्षित दूरी तक के नियमों को धता बताने से बाज नहीं आते, वहां कड़े नियम-कायदों की जरूरत से इंकार नहीं किया जा सकता। चौथी बंदी के दौरान बाजारों, सड़कों और गली-मुहल्लों में भीड़भाड़ लगनी शुरू हो गई, फिर प्रवासी श्रमिकों की घरवापसी से संक्रमण का संचरण तेज हो गया। इससे खुद सरकारों को आशंका है कि आने वाले कुछ महीने चुनौतीपूर्ण होंगे।

इस चुनौतीपूर्ण समय में सरकारों की जिम्मेदारियां पहले से कुछ बढ़ गई हैं। एक तरफ संक्रमितों की पहचान, जांच और समुचित चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराने का दबाव है, तो दूसरी तरफ नियम-कायदों का पालन कराने का। अभी तक जांच और इलाज आदि को लेकर शिकायतें दूर नहीं हो पाई हैं। बढ़ते मामलों के मद्देनजर इन सुविधाओं में बढ़ोतरी का भी भारी दबाव है।

इसलिए सर्वोच्च न्यायालय का निर्देश उचित है कि सरकारों को ऐसे निजी अस्पतालों को भी चिह्नित करना चाहिए, जिनमें सस्ते दर पर इलाज उपलब्ध कराया जा सके। नहीं तो केवल सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं के भरोसे इस समस्या पर काबू पाना जटिल बना रहेगा। यों लोगों ने लगभग स्वीकार कर लिया है कि कोरोना विषाणु से लंबे समय तक पीछा नहीं छूटने वाला, पर इसकी रोकथाम में जैसी जनभागीदारी होनी चाहिए, वह नजर नहीं आ रही। इसमें लोगों से सुरक्षा नियमों के पालन की स्वाभाविक अपेक्षा है। इन तैयारियों के बिना कोरोना संक्रमण को रोकने की राह में बाधा बनी ही रहेगी।

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