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संपादकीयः आईपीएल की जगह

आखिरकार आईपीएल मैचों को महाराष्ट्र से बाहर कराने के मुंबई उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती देने वाली महाराष्ट्र व मुंबई क्रिकेट संघों की याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दीं।
Author April 29, 2016 03:38 am
(express Photo)

आखिरकार आईपीएल मैचों को महाराष्ट्र से बाहर कराने के मुंबई उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती देने वाली महाराष्ट्र व मुंबई क्रिकेट संघों की याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दीं। यानी आईपीएल मैचों का आयोजन महाराष्ट्र से बाहर ही करना होगा। महाराष्ट्र के बुरी तरह सूखे की चपेट में होने और आईपीएल मैचों के आयोजन में पानी की बर्बादी के मद््देनजर हाईकोर्ट ने अपना फैसला सुनाया था। सर्वोच्च अदालत के फैसले से उस तर्क की पुष्टि ही हुई है।

हालांकि सुनवाई के दौरान ऐसा लग रहा था कि सर्वोच्च अदालत कुछ शर्तों के साथ मैचों की इजाजत दे देगी। पर बाद में उसे लगा कि ढेर सारी पाबंदियां थोपना और उनके क्रियान्वयन पर निगरानी रखना व्यावहारिक नहीं होगा, इसलिए बेहतर यही होगा कि मैच राज्य से बाहर कराए जाएं। अदालत का फैसला उचित तो ही है, इसमें न सिर्फ इंडियन प्रीमियर लीग बल्कि पूरे समाज के लिए एक जरूरी संदेश भी निहित है। संदेश है जल संरक्षण का।

महाराष्ट्र से रोजाना जल संकट की जैसी खबरें आ रही हैं वे दिल दहलाने वाली हैं। कई जगह टैंकरों और तालाबों की सुरक्षा के लिए पुलिस तैनात करनी पड़ी है, टैंकरों को लूटे जाने से बचाने के लिए धारा एक सौ चौवालीस लगाई गई है। झगड़े और हिंसा की जाने कितनी घटनाएं हुई हैं। राज्य के बहुत-से हिस्सों में कुएं, झीलें, तालाब आदि परंपरागत जल-स्रोत सूख गए हैं। सूखे से त्राहि-त्राहि का आलम है। कोई कह सकता है और आईपीएल मैचों से जुड़ी बहस के दौरान यह दलील बार-बार दोहराई भी गई कि मैच न होने देने से सूखे के हालात में कोई फर्क नहीं पड़ेगा। इस तर्क को सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता। पर सवाल है कि भयावह जल संकट के समय, जब राज्य के बहुत सारे लोग बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रहे हों, खेल के मैदान को मैच लायक बनाने पर पानी खर्च करना क्या औचित्यपूर्ण होता? यह बहस बेमानी थी कि साठ हजार लीटर पानी खर्च होता या साठ लाख लीटर।

सवाल प्राथमिकता और समाज के प्रति सरोकारों का है। सर्वोच्च अदालत ने इसी को रेखांकित किया है। पर सूखे के मद््देनजर हमें कई और तकाजों पर गौर करना होगा। यह सूखा केवल कम बारिश की देन नहीं है, यह लंबे समय से भूजल के अंधाधुंध दोहन का भी नतीजा है। महाराष्ट्र में चार फीसद कृषियोग्य भूमि पर गन्ने की खेती है, मगर सिंचाई का सत्तर फीसद पानी उसी में लगता है। चीनी उद्योग तथा शराब उद्योग भी पानी की बेतहाशा खपत और बर्बादी करते हैं।

महाराष्ट्र में काफी बांध हैं, पर उनका पानी उधर मोड़ दिया जाता है जिधर राज्य के उद्योगपति-राजनीतिक चाहते हैं। इसलिए इस सूखे का अकेला कारण बारिश का कम होना नहीं है। गौर से देखें तो इस सूखे के पीछे चीनी उद्योग और शराब उद्योग से लेकर सिंचाई परियोजनाओं के मनमाने इस्तेमाल तक निहित स्वार्थ साधने के ढेर सारे खेल दिखाई देंगे। याचिका के चलते आईपीएल पर काफी बहस हुई। पर इससे ज्यादा जरूरी यह है कि सूखे के ऐसे कारणों पर चर्चा हो जो एक मौसम तक सीमित नहीं हैं। बारिश में थोड़ा-बहुत उतार-चढ़ाव कोई नई बात नहीं है, यह हमेशा होता आया है। पर जब तक समाज में जलस्रोतों को सहेजने का संस्कार बना रहा, ऐसी चीख-पुकार नहीं मचती थी। सूखे का सबक साफ है, पर उसे सीखने के लिए प्राथमिकताएं बदलने की हिम्मत जुटानी होगी।

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