ताज़ा खबर
 

संपादकीयः तनाव की सीमा

चीन की साम्राज्यवादी नीतियां किसी से छिपी नहीं हैं। खासकर लद्दाख क्षेत्र में वह इसलिए दबदबा बनाए रखना चाहता है कि वह भारत को आंखें तरेर सके।

Author Published on: June 5, 2020 12:19 AM
करीब महीने भर से लद्दाख क्षेत्र में भारत और चीन की सेनाएं संघर्ष की मुद्रा में हैं।

करीब महीने भर से लद्दाख क्षेत्र में भारत और चीन की सेनाएं संघर्ष की मुद्रा में हैं। हालांकि यह पहली बार नहीं है जब वहां वास्तविक नियंत्रण रेखा पर ऐसा तनाव पैदा हुआ है। दरअसल, लद्दाख क्षेत्र में एक बड़ा इलाका ऐसा है, जिसमें सरहद की निशानदेही अब तक नहीं हो पाई है। इसके चलते कई बार अतिक्रमण का विवाद खड़ा हो जाता है और दोनों देशों के जवान सक्रिय हो जाते हैं। इस बार मामला इसलिए थोड़ा पेचीदा हो गया कि चीनी सैनिक उन क्षेत्रों में भी उतर आए, जहां पहले कभी विवाद नहीं था या नियंत्रण रेखा को लेकर किसी तरह की गलतफहमी की गुंजाइश नहीं थी। ताजा विवाद में शुरू में नेपाल ने भी चीन का साथ दिया और कालापानी जैसे क्षेत्रों पर अपना अधिकार जताया, पर अब उसका सुर कुछ बदल गया है। चीन ने भी एक बयान में अपना रुख नरम कर लिया था, पर सरहद पर उसकी सरगर्मी बनी रही। इस बीच दोनों देशों के ब्रिगेडियर और फिर मेजर जनरल स्तर के अधिकारियों की बातचीत हो चुकी है, पर वे बेनतीजा रहीं। अब शनिवार को एक बार फिर मेजर जनरल स्तर के अधिकारियों की बातचीत संभावित है। उम्मीद की जा रही है कि इससे कोई बेहतर नतीजा निकलेगा।

चीन की साम्राज्यवादी नीतियां किसी से छिपी नहीं हैं। खासकर लद्दाख क्षेत्र में वह इसलिए दबदबा बनाए रखना चाहता है कि वह भारत को आंखें तरेर सके। इसलिए जब भी भारत उस इलाके में बुनियादी ढांचे का विकास करता है, वह चीन की आंखों में चुभने लगता है। वह भारतीय सीमा से सटे कुछ इलाकों में अपनी सेनाओं के लिए जगह बनाने का प्रयास भी करता रहा है। इसी कड़ी में वह पाकिस्तान और नेपाल को भी अपने पक्ष में खड़ा करने की कोशिश करता रहा है। पाकिस्तान में उसने सड़क और बिजली आदि परियोजनाओं पर खासा खर्च कर उसे अपने पक्ष में कर चुका है। इसी तरह नेपाल में भी उसने विकास परियोजनाओं में निवेश करना शुरू किया है। यही वजह है कि लंबे समय से भारत के करीबी दोस्त रहे नेपाल का रुख भी बदला हुआ है। मगर भारत उसके दबाव में कभी नहीं आया। चाहे वह पिछले साल डोकलाम में चीन की गतिविधियां बढ़ाने का मौका रहा हो या फिर लद्दाख इलाके में सड़क बनाने पर चीन की आपत्ति, भारत ने सख्ती से अपना पक्ष कायम रखा।

दरअसल, जबसे जम्मू-कश्मीर की स्वायत्ता समाप्त कर दी गई है और भारत ने उस इलाके का नया नक्शा पेश किया है, तबसे लद्दाख क्षेत्र को लेकर चीन कुछ अतिरिक्त सतर्क हुआ है। उसे लगने लगा है कि अगर भारत को उस इलाके में बुनियादी ढांचा विकसित करने से नहीं रोका गया तो भारतीय सेना की चीन के बहुत करीब तक पहुंच आसान हो जाएगी। इसलिए उसने सीमा पर सामरिक सरगर्मी बढ़ा दी है। मगर जिन हिस्सों को लेकर वह आपत्ति उठा रहा है, उनकी निशानदेही बहुत पुरानी है और उनमें भारतीय गतिविधियों से किसी भी तरह अंतरराष्ट्रीय समझौतों का उल्लंघन नहीं होता। फिलहाल दुनिया एक ऐसे दौर में पहुंच गई है, जब राष्ट्रों की ताकत अर्थव्यवस्था और तकनीक से तय होने लगी है, विचित्र है कि चीन गोले-बारूद के जरिए अपनी हैसियत जाहिर करने का प्रयास करता है। इससे उसे कोई लाभ नहीं मिलने वाला। इसलिए उम्मीद की जाती है कि बातचीत के जरिए जल्दी ही मतभेद दूर होंगे और दोनों देशों की सेनाएं वापस लौटेंगी।

Hindi News के लिए हमारे साथ फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन, टेलीग्राम पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News AppOnline game में रुचि है तो यहां क्‍लिक कर सकते हैं।

Next Stories
1 संपादकीय: उद्यमियों का संकट
2 संपादकीय: जानलेवा पाठ
3 संपादकीय: भरोसे का विकास