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संपादकीयः नए रिश्तों का दौर

इस बात से कतई इंकार नहीं किया जा सकता कि एशिया में भारत और आस्ट्रेलिया दोनों का ही एक साझा विरोधी चीन है। इसलिए भारत और आस्ट्रेलिया के इस सामरिक गठजोड़ पर उसकी निगाहें होंगी।

Author Published on: June 6, 2020 2:48 AM
इस बात से कतई इंकार नहीं किया जा सकता कि एशिया में भारत और आस्ट्रेलिया दोनों का ही एक साझा विरोधी चीन है।

भारत और आस्ट्रेलिया के बीच हाल में जो समझौते हुए हैं, वे दोनों देशों के बीच बढ़ती सामरिक भागीदारी को रेखांकित करते हैं। ये करार इस बात का भी प्रमाण हैं कि दोनों देश अब एक दूसरे के महत्त्व को समझ रहे हैं और भविष्य की चुनौतियों का मिल कर सामना करेंगे। गुरुवार को हुई यह शिखर बैठक इसलिए भी खास रही क्योंकि भारत और आस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्रियों ने वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए वार्ता की और इसके बाद सैन्य क्षेत्र से जुड़े व अन्य समझौते हुए। हालांकि भारत और आस्ट्रेलिया के कारोबारी रिश्ते तो पहले से हैं और भारत अपनी ऊर्जा संबंधी जरूरतें पूरी करने के लिए आस्ट्रेलिया से यूरेनियम खरीदता रहा है। लेकिन पिछले कुछ सालों में दोनों देशों के बीच रिश्तों का जो दायरा बढ़ा है, वह भारत के एक बड़ी शक्ति के रूप में उभरने का भी संकेत है। हाल में जो सबसे महत्त्वपूर्ण करार- म्यूचुअल लॉजिस्टिक सपोर्ट एग्रीमेंट (एमएलएसए) हुआ है, उसका सैन्य सहयोग क्षेत्र पर जोरदार असर देखने को मिल सकता है। इस करार से दोनों देश एक दूसरे के सैन्य ठिकानों और सैन्य सुविधाओं का इस्तेमाल कर सकेंगे। इसे इस रूप में भी देखा जा सकता है कि दोनों देशों की सैन्य गतिविधियों का दायरा अब तेजी से बढ़ेगा।

इस बात से कतई इंकार नहीं किया जा सकता कि एशिया में भारत और आस्ट्रेलिया दोनों का ही एक साझा विरोधी चीन है। इसलिए भारत और आस्ट्रेलिया के इस सामरिक गठजोड़ पर उसकी निगाहें होंगी। ऐसे में दोनों देशों के बीच हुआ यह सामरिक समझौता चीन पर एक दबाव का भी काम कर सकता है। भारत-चीन सीमा विवाद दशकों पुराना है और समय-समय पर चीन भारत के लिए मुश्किलें पैदा करने से बाज नहीं आता। एशिया में भारत को अलग-थलग करने के लिए उसने पाकिस्तान के अलावा नेपाल, श्रीलंका, मालद्वीव, बांग्लादेश जैसे देशों को भी अपने प्रभाव में ले रखा है। हाल में आस्ट्रेलिया और चीन के रिश्तों में ज्यादा खटास इसलिए भी आई है, क्योंकि कोरोनाविषाणु फैलाने के लिए उसे जिम्मेदार ठहराने और इस संपूर्ण प्रकरण की जांच की मांग के लिए दबाव डालने वालों में आस्ट्रेलिया भी है, जिसने काफी सख्त रुख अख्तियार किया है। इसके अलावा पिछले कुछ सालों से दक्षिण प्रशांत क्षेत्र में चीन की सैन्य गतिविधियां जिस तेजी से बढ़ी हैं, वह क्षेत्रीय शांति के कम बड़ा खतरा नहीं है। दक्षिण चीन सागर में चीन के सैन्य अड्डे और श्रीलंका व मालद्वीव के जरिए हिंद महासागर क्षेत्र में चीन के विस्तारवादी कदमों ने अमेरिका, भारत और आस्ट्रेलिया की नींद उड़ा रखी है। ऐसे में एमएलएसए को ज्यादा टालना दोनों देशों को भारी पड़ता।

एशिया प्रशांत और हिंद महासागर क्षेत्र में चीन के बढ़ते कदम को रोकने के लिए अमेरिका, जापान, आस्ट्रेलिया और भारत पिछले कुछ सालों से काम कर रहे हैं। इस मामले में अमेरिका भारत और आस्ट्रेलिया को इसलिए भी तवज्जो दे रहा है क्योंकि कभी चीन के खिलाफ मोर्चा खोलने की जरूरत पड़े तो दो बड़े सैन्य सहयोगी उसके साथ रहें। ऐसे में अगर भारत और आस्ट्रेलिया के बीच सामरिक समझौते होते हैं, तो इससे इन चारों देशों के सुरक्षा चक्र को और मजबूती मिलेगी। भारत की इस वक्त सबसे बड़ी जरूरत सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता के लिए दावेदारी और न्यूक्लियर सप्लायर ग्रुप (एनएसजी) का सदस्य बनने के लिए समर्थन जुटाने की है। अगर भारत और आस्ट्रेलिया के बीच बड़ा सामरिक करार हुआ है तो उम्मीद की जानी चाहिए कि वह भारत को सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बनाने का समर्थन भी करेगा।

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