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बिहार का गतिरोध

लालू प्रसाद यादव के परिजनों के घरों पर पड़े सीबीआइ छापों के बाद बिहार में शुरू हुई राजनीतिक उथल-पुथल शांत होने का नाम नहीं ले रही।

लालू प्रसाद यादव के साथ बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (File Photo)

लालू प्रसाद यादव के परिजनों के घरों पर पड़े सीबीआइ छापों के बाद बिहार में शुरू हुई राजनीतिक उथल-पुथल शांत होने का नाम नहीं ले रही। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने शनिवार को दिल्ली में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी और जद (एकी) नेता शरद यादव से मुलाकात की, तो कयास लगाए जाने लगे कि वे उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव और स्वास्थ्य मंत्री तेजप्रताप यादव के इस्तीफे के लिए उन्हें मना लेंगे। हालांकि सूत्रों के मुताबिक राहुल गांधी ने तर्क दिया कि महज एफआइआर के आधार पर उनसे इस्तीफा मांगना उचित नहीं है। उधर बिहार में विपक्षी दल भाजपा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर लगातार दबाव बना रही है कि लालू यादव के दोनों बेटों को मंत्रिमंडल से बाहर करें। तेजस्वी यादव पर होटल के बदले जमीन लेने और तेजप्रताप पर रेलवे ठेकों में अनियमितता के आरोप हैं। इसलिए नैतिक आधार पर उनसे इस्तीफे की मांग की गई, मगर लालू यादव ने इस तरह की किसी भी संभावना से इनकार कर दिया। इसलिए नीतीश कुमार पर नैतिक दबाव बना हुआ है कि वे इन दोनों को मंत्रिमंडल से विदा करें।

मगर मुश्किल यह है कि अगर नीतीश कुमार तेजस्वी और तेजप्रताप को मंत्रिमंडल से बाहर करते हैं तो उनका मुख्य सहयोगी राष्ट्रीय जनता दल उनसे अलग हो सकता है। इस तरह न सिर्फ उनकी सरकार अल्पमत में आ जाएगी, बल्कि जिन सिद्धांतों पर उन्होंने राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस के साथ मिल कर महागठबंधन बनाया था और भाजपा को सत्ता से बाहर रखने में कामयाबी हासिल की थी, वे कहीं हाशिए पर चले जाएंगे। राजद के अस्सी विधायक नीतीश कुमार के साथ हैं। हालांकि सुशील मोदी बहुत पहले एलान कर चुके हैं कि वे नीतीश कुमार सरकार पर संकट नहीं आने देंगे। सरकार चलाने में उनकी मदद करेंगे। इशारा साफ है कि वे उन्हें भाजपा के साथ मिल कर सरकार चलाने को उकसा रहे हैं। मगर ऐसा होगा तो नीतीश कुमार के सिद्धांतों पर सवाल उठेंगे। इसलिए राजद लगातार इस बात पर जोर दे रहा है कि वह सांप्रदायिक शक्तियों के खिलाफ अपनी लड़ाई जारी रखेगा। ऐसे में नीतीश कुमार के सामने एक चुनौती साफ-सुथरा मंत्रिमंडल रखने और भ्रष्टाचार के खिलाफ अपना रुख स्पष्ट करने की है तो दूसरी तरफ सांप्रदायिक ताकतों से लड़ने की। उनके इस पसोपेश के चलते अब राजद और जद (एकी) नेताओं के बीच बयानबाजियों का दौर शुरू हो गया है। बिहार की राजनीति में लगातार हलचल बनी हुई है। उधर भाजपा ने चेतावनी दी है कि अगर नीतीश कुमार ने तेजस्वी और तेजप्रताप का इस्तीफा नहीं लिया तो वह अगले हफ्ते विधानसभा की कार्यवाही नहीं चलने देगी।

बिहार के राजनीतिक संकट से एक बार फिर भ्रष्टाचार से लड़ने में सरकारों की इच्छाशक्ति पर सवाल उठने लगे हैं। कानून के मुताबिक दोष साबित न होने तक किसी राजनेता को उसके पद से हटने को बाध्य नहीं किया जा सकता। इसी का फायदा तेजस्वी और तेजप्रताप यादव को मिल रहा है। मगर उनके खिलाफ सीबीआइ की तरफ से एफआइआर दर्ज होने के बाद उनसे नैतिक आधार पर पद छोड़ने की अपेक्षा स्वाभाविक है। मगर इसके जरिए भाजपा जिस तरह महागठबंधन को तोड़ने और सत्ता में अपनी हिस्सेदारी बनाने का सपना देख रही है, उससे भ्रष्टाचार का मुद्दा राजनीतिक खींचतान में बदल गया है। जबकि सत्ता बचाने से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण आम लोगों में अपनी साख बनाए रखने का है। राजनीतिक लंल में भ्रष्टाचार का मामला कहीं दब न जाए, इसका ध्यान रखना जरूरी है।

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