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नीतीश को कमान

निश्चय ही बिहार में जद (एकी), राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस के महा गठबंधन को मिली जीत ने नीतीश का कद बढ़ाया है।

Author नई दिल्ली | April 12, 2016 1:59 AM
एनडीए में शामिल होने की दशा में 71 में से करीब 20 विधायक नीतीश के खिलाफ जा सकते हैं। पार्टी के 12 सांसदों में से 6 भी इसी तरह की मुखालफत कर सकते हैं।

जनता दल (एकी) की कमान अब नीतीश कुमार के हाथ में आ गई है। जद (एकी) का मुख्य आधार बिहार में है और वहां नीतीश ही पार्टी का चेहरा रहे हैं। पार्टी में उनका केंद्रीय स्थान शुरू से रहा है। ऐसे में पार्टी ने उन्हें अपना नया अध्यक्ष चुना तो इसे बहुत कुछ स्वाभाविक ही कहा जाएगा। अलबत्ता इससे एक व्यक्ति एक पद के सिद्धांत की अवहेलना जरूर हुई है। शरद यादव एक दशक तक जद (एकी) के अध्यक्ष रहे। अगर वे चौथी बार भी अध्यक्ष बनाए जाते तो इसके लिए पार्टी के संविधान में संशोधन करना पड़ता और वह व्यक्ति-पूजा का ही एक उदाहरण होता। नए अध्यक्ष के लिए नीतीश कुमार के नाम का प्रस्ताव खुद शरद यादव ने पेश किया और वह सर्वसम्मति से पारित हुआ।

पार्टी अध्यक्ष के तौर पर नीतीश की विधिवत ताजपोशी तेईस अप्रैल को पटना में राष्ट्रीय परिषद की बैठक के समय होगी। जिस पार्टी को नीतीश ने खड़ा किया हो और जो उनकी लोकप्रियता के सहारे आगे बढ़ी हो, उसमें उनकी आम स्वीकार्यता के बारे में शक की गुंजाइश नहीं हो सकती। पर सवाल है कि क्या वे जद (एकी) का विस्तार अन्य राज्यों में कर पाएंगे, जैसी कि उनकी योजना है? निश्चय ही बिहार में जद (एकी), राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस के महा गठबंधन को मिली जीत ने नीतीश का कद बढ़ाया है। यह जीत उन्हें तब हासिल हुई जब लोकसभा चुनावों में शानदार कामयाबी मिलने से उत्साहित भाजपा वहां सरकार बनाने का मंसूबे पाले हुए थी। लेकिन बिहार में मोदी का जादू नहीं चला और जनादेश नीतीश के पक्ष में आया। राजद का आधार जुड़ने के साथ ही उनकी साफ-सुथरी छवि और सुशासन के उनके दावे ने रंग दिखाया।

अब नीतीश चाहते हैं कि ‘जनता परिवार’ एक होकर विपक्ष की धुरी बने। कांग्रेस की खस्ता हालत ने भी उन्हें ऐसा सोचने के लिए प्रेरित किया होगा। पर जनता परिवार को एक कर नई पार्टी बनाने की कोशिशें कई बार शुरू होकर ठोस आकार लेने से पहले ही बिखर चुकी हैं। बिहार चुनाव से पहले मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व में इसे अंजाम दिया जाना था। पर इसमें समाजवादी पार्टी को अपना कोई लाभ होता नहीं दिखा और मुलायम सिंह पीछे हट गए। नई पहल में लालू प्रसाद यादव भी शामिल नहीं दिखते। ले-देकर विलय कर नई पार्टी बनाने की कवायद में जद (एकी) को अजित सिंह के राष्ट्रीय लोकदल, झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी के झारखंड विकास मोर्चा और कमल मोरारका की समाजवादी जनता पार्टी के साथ आने की उम्मीद है। इनमें से सजपा की कोई खास ताकत नहीं है।

उत्तर प्रदेश में न तो मरांडी कोई असर डाल सकते हैं न अजित सिंह झारखंड या बिहार में। उत्तर प्रदेश में गैर-यादव पिछड़ा वर्ग में सेंध लगाने की योजना नीतीश की रही होगी, उसे भाजपा ने केशव प्रसाद मौर्य को अपना नया प्रदेश अध्यक्ष घोषित करके पहले ही कुंद कर दिया है। जनता दल से छिटक कर बने दलों में ओमप्रकाश चौटाला के इंडियन नेशनल लोकदल और एचडी देवगौड़ा के जनता दल (सेक्युलर) की भी गिनती होती है। कभी तीसरा मोर्चा बनाने और कभी सबको मिला कर एक दल बनाने के प्रयासों में ये दोनों पार्टियां भी शामिल रहती थीं। अलबत्ता उन कोशिशों का कोई नतीजा नहीं निकला। लेकिन इस बार तो ये फिलहाल ऐसी किस पहल में सम्मिलित नहीं हैं। ऐसे में अगर नीतीश की योजना रंग लाई तो भी उससे निकट भविष्य में कोई बड़ी राजनीतिक ताकत बनने की सूरत नजर नहीं आती।