ताज़ा खबर
 

संपादकीयः विवाद की तकनीक

श्रीनगर के राष्ट्रीय तकनीकी संस्थान में छात्रों के दो गुटों के बीच तकरार को जिस हद तक बढ़ने दिया गया, वह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। यह साफ है कि हालात को संभालने की ठीक से कोशिश नहीं की गई।

Author April 8, 2016 3:18 AM
(IE Pic)

श्रीनगर के राष्ट्रीय तकनीकी संस्थान में छात्रों के दो गुटों के बीच तकरार को जिस हद तक बढ़ने दिया गया, वह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। यह साफ है कि हालात को संभालने की ठीक से कोशिश नहीं की गई। नौबत यहां तक आ पहुंची कि केंद्रीय गृह मंत्रालय को हस्तक्षेप करने की जरूरत महसूस हुई, और मानव संसाधन विकास मंत्रालय को वहां अपनी एक टीम भेजनी पड़ी। यह टीम वहां ग्यारह अप्रैल तक रहेगी। यह देखते हुए कि हिंसा समेत घटनाक्रम की जांच चल रही है और राज्य सरकार ने सभी छात्रों की सुरक्षा का भरोसा दिलाया है, स्थिति को जल्दी से जल्दी सामान्य हो जाना चाहिए।

समस्या यह है कि रह-रह कर कोई भावनात्मक मुद्दा तलाशने या उभारने की कोशिश हमारी राजनीति की फितरत होती जा रही है। श्रीनगर के राष्ट्रीय तकनीकी संस्थान में विवाद की शुरुआत भारत और वेस्ट इंडीज के टी-20 मुकाबले के बाद हुई। आरोप है कि कुछ स्थानीय छात्रों ने मैच में भारत की हार का जश्न मनाया था। दूसरे वर्ग यानी बाहर से वहां पढ़ने आए छात्रों ने इस पर स्वाभाविक ही एतराज जताया। विरोध जल्दी ही कहासुनी और झड़प में बदल गया।

लेकिन अगर संस्थान के प्रशासन ने तत्परता और सूझबूझ दिखाई होती तो तनाव पर शुरू में ही काबू पाया जा सकता था। लेकिन ऐसा लगता है कि आपसी सहमति बनाने तथा सौहार्द कायम करने की गंभीरता से पहल नहीं हुई। विवाद को इस हद तक बढ़ने से रोका जा सकता था। मैच में भारत की हार पर खुशी मनाना निहायत आपत्तिजनक है। पर जहां तक कश्मीर का सवाल है, वहां ऐसा वाकया होना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। घाटी में सड़कों पर खुलेआम भारत-विरोधी नारे बहुत दफा लगे हैं। पर वहां की ऐसी घटनाओं को बाकी देश से भिन्न परिप्रेक्ष्य में और इस समझ के साथ देखा जाता रहा है कि यह कश्मीरी लोगों के असंतोष का इजहार है और कश्मीर समस्या पूरी तरह सुलझने के बाद ऐसे प्रसंग घटित नहीं होंगे।

बाहर के जिन छात्रों ने तीखी प्रतिक्रिया दिखाई उनमें शायद यह परिपक्वता नहीं रही होगी। लेकिन एनआईटी के प्रशासन ने संवेदनशीलता और परिपक्वता का परिचय क्यों नहीं दिया? जो विवाद बातचीत और समझाने-बुझाने से खत्म हो सकता था, उसे एनआईटी प्रशासन के एक फैसले ने काफी चिंताजनक स्तर तक बढ़ा दिया। पुलिस बुला ली गई और उसने लाठीचार्ज कर दिया। नतीजतन अब ‘बाहरी’ छात्रों ने प्रशासन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। देखना है कि दौरे पर गई मंत्रालय की टीम खाली हाथ लौटती है, या वह इस नाजुक स्थिति को संभालने में कोई कारगर भूमिका निभा पाती है।

यह मामला राज्य की भाजपा-पीडीपी सरकार के लिए भी एक परीक्षा की घड़ी है। शायद ही कोई गठबंधन इतना विरोधाभासी रहा हो जितना भाजपा और पीडीपी का है। पीडीपी का आधार घाटी में है तो भाजपा का जम्मू में। यही नहीं, दोनों दल अलग-अलग धार्मिक समुदाय की राजनीति करते हैं। लेकिन दोनों दलों के विरोधाभास को खाई पाटने के एक ऐतिहासिक अवसर में भी बदला जा सकता है। क्या ऐसा हो पाएगा? एक हिंदूवादी संगठन ने जम्मू बंद का आयोजन कर डाला तो राज्य भाजपा के कुछ लोगों ने देश के दूसरे हिस्सों में कश्मीरी छात्रों की सुरक्षा खतरे में पड़ने की चेतावनी दे डाली। ऐसे बयान उस जिम्मेदारी के अनुरूप नहीं हैं जो इस राज्य में भाजपा ने स्वीकार की है।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

X