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संपादकीयः निर्मल गंगा

गंगा को प्रदूषण मुक्त करने के लिए सरकारी स्तर पर शोधन संयंत्र लगाने से निस्संदेह काफी हद तक कामयाबी मिलेगी, पर इस दिशा में औद्योगिक इकाइयों को भी जवाबदेह बनाना जरूरी है।

अगले साल हरिद्वार में कुंभ लगने वाला है।

अब गंगा नदी को प्रदूषण मुक्त बनाने की दिशा में किए गए प्रयासों के कुछ सार्थक नतीजे नजर आने शुरू हो सकते हैं। पिछले तीस सालों से अधिक समय से गंगा को निर्मल बनाने की योजना चल रही है, इस पर अरबों रुपए खर्च भी हो चुके हैं, पर गंगा की सेहत दिन पर दिन बिगड़ती ही गई। हालत यह हो गई थी कि इस पवित्र नदी के पानी से आचमन करने वाले लोग भी इसमें डुबकी लगाने से हिचकने लगे थे। फिर राजग सरकार ने इसके लिए अलग से मंत्रालय बनाया और नमामि गंगे योजना के तहत गंगा के निर्मलीकरण पर मुख्य रूप से ध्यान केंद्रित किया। पिछले करीब छह सालों में इस पर काफी काम किया गया है। दो साल पहले प्रयागराज में आयोजित कुंभ में उसके नतीजे भी नजर आए। शहरों कारखानों का जल-मल सीधे गंगा में मिलने से रोक दिया गया। इसके लिए जल-मल शोधन संयंत्र लगाए गए। अगले साल हरिद्वार में कुंभ लगने वाला है। इसके मद्देनजर प्रधानमंत्री ने हरिद्वार और उसके आसपास की जगहों में लगाए गए शोधन संयंत्रों का उद्घाटन किया। अब कारखानों और शहरी इलाकों का प्रदूषित जल सीधे गंगा में गिरने के बजाय शोधित होकर गिरेगा। इस तरह गंगा के निर्मलीकरण की दिशा में यह एक उल्लेखनीय काम होगा।

करीब तीस साल से प्रयास किया जा रहा था कि शहरों और औद्योगिक क्षेत्रों का गंदा पानी गंगा में गिरने से रोका जाए, मगर तमाम सख्ती के बावजूद कारखाना मालिक नियम-कायदों की अनदेखी करते रहे। औद्योगिक इलाकों और शहरों में जल-मल शोधन संयंत्र लगाए जाने थे, कई जगह लगे भी, मगर उनका संचालन और देखरेख समुचित न हो पाने की वजह से अपेक्षित कामयाबी नहीं मिल पाई। कायदे से औद्योगिक इकाइयों को अपने परिसर में जल शोधन संयंत्र लगाना चाहिए और शोधन के बाद ही अपना पानी नदियों में छोड़ना चाहिए, मगर ज्यादातर कारखाने अपना खर्च बचाने के लोभ में इसका पालन नहीं करते देखे जाते। इनमें बड़े पैमाने पर ऐसे कारखाने हैं, जिनमें चमड़े की सफाई, कपड़े की रंगाई, स्टील के बर्तनों वगैरह की धुलाई आदि के काम होते हैं, जिनसे निकलने वाला पानी विषैला होता है। इसके अलावा कई रासायनिक वस्तुएं बनाने वाले कारखाने भी अपना जहरीला पानी नदियों में छोड़ देते हैं। गंगा के रास्ते में पड़ने वाले शहरों में ऐसे कारखाने बड़ी संख्या में हैं। उनका गंदा और जहरीला पानी गंगा में मिल कर उसे प्रदूषित करता रहता है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की तमाम सख्तियों के बावजूद इस प्रवृत्ति पर अंकुश नहीं लग पाया है।

गंगा को प्रदूषण मुक्त करने के लिए सरकारी स्तर पर शोधन संयंत्र लगाने से निस्संदेह काफी हद तक कामयाबी मिलेगी, पर इस दिशा में औद्योगिक इकाइयों को भी जवाबदेह बनाना जरूरी है। कारखानों का विषैला पानी न सिर्फ गंगा में गंदगी बढ़ाता है और उसके जल-जीवों के जीवन को खतरे में डालता है, बल्कि इस नदी के किनारे बसे गांवों के जीवन और कृषि पर भी बहुत बुरा असर डालता है। हालांकि प्रधानमंत्री ने गंगा के किनारे बसे गांवों और शहरों को ध्यान में रखते हुए नमामि गंगे योजना को विस्तार दिया है, पर इस दिशा में सतत प्रयास की आवश्यकता है। जल-मल शोधन संयंत्रों की एक उम्र होती है और उचित देखभाल न होने से उनके समय से पहले भी बैठ जाने का खतरा रहता है। मसलन, हरिद्वार की परियोजनाएं पंद्रह साल की अवधि को ध्यान में रख कर लगाई गई हैं। इसलिए गंगा निर्मलीकरण के लिए सतत और समग्र प्रयास होते रहना चाहिए।

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