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संपादकीय : आखिर न्याय

निर्भया हत्याकांड के चारों दोषियों को शुक्रवार सुबह तड़के फांसी पर लटका दिया गया। बता दें निर्भया कांड की गूंज पूरी दुनिया में हुई थी। दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग को लेकर देशभर में जिस तरह से लोग सड़कों पर उतरे थे और राष्ट्रपति भवन के आसपास कई दिन तक हजारों लोगों की भीड़ ने आक्रोश व्यक्त किया था।

बेटी को इंसाफ दिलाने की लड़ने वाली निर्भया की मां

निर्भया कांड के चार गुनाहगारों को शुक्रवार सुबह दिल्ली की तिहाड़ जेल में फांसी पर लटका दिया। इस जघन्य कांड के दोषियों को सजा से यह बात एक बार फिर साफ हो गई है कि न्याय मिलने में देरी भले हो, पर दोषी कभी भी कानून से बच नहीं सकते। दोषियों को सजा से न्याय व्यवस्था के प्रति लोगों का भरोसा और मजबूत हुआ है। लेकिन न्याय में देरी को लेकर जो सवाल अब तक उठते रहे हैं, वे वहीं के वहीं हैं। दुनियाभर में भारत को शर्मसार कर देने वाली इस घटना को अंजाम देने वाले जिस तरह से आखिरी वक्त तक अपने बचाव के लिए कानूनी दांवपेच आजमाते रहे और सजा पर अमल टलता रहा, उससे हमारी न्याय प्रणाली की पेचीदगी और इसके काम करने के तरीके पर सवाल उठने लाजिमी हैं। बचाव पक्ष का एक वकील तो इस तरह का दावा हमेशा से करता रहा कि वह दोषियों को फांसी के फंदे तक कभी नहीं पहुंचने देगा। इससे कई बार तो ऐसा लगने लगा था कि दोषियों की सजा पर अमल हो भी पाएगा या नहीं।

निर्भया कांड की गूंज पूरी दुनिया में हुई थी। दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग को लेकर देशभर में जिस तरह से लोग सड़कों पर उतरे थे और राष्ट्रपति भवन के आसपास कई दिन तक हजारों लोगों की भीड़ ने आक्रोश व्यक्त किया था, उसी का नतीजा था कि सरकार और अदालत पर कार्रवाई के लिए एक तरह का भारी दबाव बना और मामले में नियमित रूप से सुनवाई हुई। पुलिस ने जिस तरह की फुर्ती दिखाई और सभी आरोपियों को जल्द पकड़ लिया और मामले से जुड़े सबूत जुटा कर उन्हें अदालत में रखा, उससे यह साफ हो गया कि अगर पुलिस चाहे तो ऐसे मामलों के वर्षों तक लटकने की नौबत ही न आए। इस मामले की सुनवाई त्वरित अदालत में चली और एक साल से भी कम समय में सभी दोषियों को सजा सुना दी गई।

लेकिन इसके बाद सात साल से भी ज्यादा समय तक दोषियों के वकील जिस तरह से कानूनी जटिलताओं और प्रक्रियाओं का फायदा उठाते हुए मामले को खींचते रहे, वह हमारी न्याय प्रणाली के लिए एक बड़ी चुनौती है। राष्ट्रपति से दया याचिका खारिज हो जाने के बाद भी जिस तरह दोषी सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाते रहे, किसी न किसी बहाने पुनर्विचार याचिकाएं दाखिल करते रहे, वह हैरान करने वाला रहा। एक दोषी ने तो इस बात पर ही नई याचिका दायर कर दी कि उसके साथ जेल में रहने के दौरान उत्पीड़न हुआ, तो दूसरे दोषी के मामले ने एक अर्जी अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में दायर कर मामले को लटकाने की चाल चली। भारत की न्याय व्यवस्था का बुनियादी सिद्धांत यह है कि भले सौ गुनाहगार छूट जाएं, लेकिन किसी निर्दोष को सजा न हो।

इसी वजह से दोषियों को हरसंभव कानूनी विकल्प आजमा लेने के मौके दिए गए। हालांकि सभी दोषियों के खिलाफ सारे पुख्ता सबूत थे, इसलिए सजा मिलने से कोई नहीं रोक सकता था। शायद ही पहले कभी ऐसा हुआ होगा जब राष्ट्रपति की ओर से दया याचिका खारिज हो जाने के बाद मामले को इतना खींचने की कोशिशें हुर्इं। दरअसल न्याय प्रक्रिया इतनी जटिल है कि बचाव पक्ष हर स्तर पर कानूनी नुक्ते निकालता है और उनका फायदा उठाता है। इस दोष को दूर किए बिना जल्द और वाजिब न्याय की कल्पना कर पाना मुश्किल है। निर्भया कांड जैसे न जाने कितने ही मुकदमे अदालतों में लंबित पड़े होंगे और पीड़ित न्याय का इंतजार कर रहे होंगे!

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