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साजिश पर नजर

रविवार को एनआइए ने हुर्रियत के कई अहम ठिकानों पर छापे मारे। इस छापेमारी में उसने कई महत्त्वपूर्ण दस्तावेज बरामद किए।

Author August 1, 2017 5:33 AM
अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी। (Source: PTI)

भारत में खासकर कश्मीर में आतंकवाद के वित्तीय स्रोतों को खंगालने में जुटी एनआइए यानी राष्ट्रीय जांच एजेंसी को एक बार फिर कुछ ऐसे सबूत मिले हैं जो घाटी में उपद्रव व अशांति के पीछे हुर्रियत का हाथ होने की तरफ इशारा करते हैं। रविवार को एनआइए ने हुर्रियत के कई अहम ठिकानों पर छापे मारे। इस छापेमारी में उसने कई महत्त्वपूर्ण दस्तावेज बरामद किए। इनमें एक ऐसा कैलेंडर भी शामिल है जो घाटी में अस्थिरता पैदा करने तथा उपद्रव फैलाने का खाका पेश करता है। कैलेंडर पिछले साल का है और इस पर हुर्रियत के दूसरे धड़े तहरीक-ए-हुर्रियत के नेता सैयद अली शाह गिलानी के हस्ताक्षर हैं। कैलेंडर विभिन्न तारीखों पर सड़क जाम करने और काला दिवस मनाने से लेकर सेना के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन करने तक, ऐसे कार्यक्रमों के पूर्व-नियोजित होने का संकेत करता है। इसी छापेमारी के दौरान एनआइए ने जम्मू में गिलानी के करीबी वकील देविंदर सिंह बहल को गिरफ्तार कर लिया। एनआइए को शक है कि बहल हुर्रियत नेताओं के लिए कूरियर का काम करता था और हुर्रियत के पाकिस्तानी मददगारों से भी उसके संपर्क हो सकते हैं। वह तहरीक-ए-हुर्रियत के विधि प्रकोष्ठ का सदस्य भी है।

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कैलेंडर की बरामदगी और बहल की गिरफ्तारी, दोनों सरकार के लिए काफी मायने रखती हैं। गिलानी के हस्ताक्षर वाले इस कैलेंडर के सहारे सरकार अपने इस तर्क को और मजबूती से रख सकेगी कि घाटी में सुरक्षा बलों के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन स्वाभाविक जन-रोष का परिणाम नहीं रहे हैं, बल्कि इनके पीछे सोची-समझी रणनीति होती थी। खाका पहले ही बना लिया जाता था कि कब क्या करना है और सबको इसकी सूचना दी जाती थी। बहल से पूछताछ में हुर्रियत के वित्तीय स्रोतों और उनके इस्तेमाल के मदों तथा तरीकों के बारे में कुछ और खुलासा हो सकेगा। आतंकी फंडिंग की जांच के सिलसिले में एनआइए ने हफ्ता भर पहले हुर्रियत के सात कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया था। इन सातों के अलावा गिलानी के बेटों और दामाद से भी पूछताछ चल रही है। उम्मीद है कि इस सारी पूछताछ से और भी सबूत एनआइए के हाथ लगेंगे। इसके दो बड़े फायदे जाहिर हैं। एक यह कि घाटी में अस्थिरता फैलाने वाली ताकतों को बेनकाब करने तथा उनके मंसूबों को ध्वस्त करने में मदद मिलेगी। दूसरे, जमात-उद-दावा जैसे संगठनों से इन अलगाववादियों को पैसा मिलने के सबूत यह बताएंगे कि इस सारे मामले में पाकिस्तान की कैसी भूमिका है। गौरतलब है कि जमात-उद-दावा लश्कर-ए-तैयबा के संस्थापक हाफिज सईद का संगठन है, जिसे टेरर फंडिंग के मामले में भी एनआइए ने आरोपी बनाया है।

यह उम्मीद करना शायद बेमानी होगा कि ताजा सबूतों को दिखा कर पाकिस्तान को हाफिज सईद या जमात-उद-दावा पर नकेल कसने के लिए राजी किया जा सकेगा। लेकिन अंतरराष्ट्रीय समुदाय के समक्ष जरूर इन सबूतों की दोहरी उपयोगिता है। एक यह कि पाकिस्तान की जमीन से आतंकवादी गतिविधियां चलाई जा रही हैं, और तथ्यों से अवगत कराने पर भी वहां की सरकार कुछ नहीं कर रही है। क्या यह रवैया भारत के साथ-साथ विश्व शांति के लिए भी खतरा नहीं है? दूसरा यह कि कश्मीर में कुछ महीनों से लगातार जारी अशांति एक गहरी साजिश की देन है। आतंकवाद के वित्तीय स्रोतों को बंद करने का आह्वान अब हर अंतरराष्ट्रीय मंच से किया जाता है। जी-20 के हाल में हुए सम्मेलन में यह मसला प्रमुखता से उठा था। लिहाजा, उम्मीद की जानी चाहिए कि कश्मीर घाटी में आतंकी गतिविधियों के वित्तीय स्रोत भी अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए चिंता का विषय बनेंगे।

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