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प्रदूषण का प्रवाह

गंगा सफाई योजना को शुरू हुए करीब तीस साल हो गए। इस पर अब तक अरबों रुपए बहाए जा चुके हैं। मगर राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी की वजह से नदियों को साफ-सुथरा बनाने का लक्ष्य अभी तक कागजी ही बना हुआ है।

Author नई दिल्ली | February 19, 2016 2:01 AM
गंगा सफाई योजना को शुरू हुए करीब तीस साल हो गए। इस पर अब तक अरबों रुपए बहाए जा चुके हैं। (फाइल फोटो)

राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने गंगा में प्रदूषण फैलाने वाली औद्योगिक इकाइयों पर एक बार फिर नकेल कसने की कोशिश की है। हरिद्वार से कानपुर के बीच स्थित उन तमाम उद्योगों को कारण बताओ नोटिस भेजा है, जिनका प्रदूषित पानी और रासायनिक कचरा सीधे गंगा में आकर मिलता है। एनजीटी ने औद्योगिक इकाइयों से पूछा है कि उन्होंने प्रदूषण रोकने के लिए क्या उपाय किए हैं। क्यों न प्रदूषण नियंत्रण संबंधी नियमों का पालन न करने के कारण उन्हें बंद कर दिया जाए। एनजीटी ने उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को आदेश दिया है कि वह प्रदूषण फैलाने वाली एक हजार सत्तर इकाइयों की सूची वेबसाइट पर डाले। साथ ही इन इकाइयों की आॅनलाइन निगरानी की प्रणाली विकसित की जाए। इससे पहले भी एनजीटी, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय नदियों में प्रदूषण फैलाने वाली औद्योगिक इकाइयों को कड़े निर्देश जारी कर चुके हैं। पर इससे कोई फर्क नहीं पड़ा है। हरिद्वार से कानपुर के बीच हजारों ऐसे छोटे-बड़े कारखाने हैं, जिनमें कागज की लुगदी, चमड़े, लोहे, कपड़े आदि का प्रसंस्करण किया जाता है। इन इकाइयों से भारी मात्रा में हानिकारक रसायन मिला पानी निकलता है और उसे बगैर किसी शोधन के सीधे गंगा में बहा दिया जाता है। हैरानी की बात है कि नदियों में बढ़ते प्रदूषण को लेकर अदालतें सरकारों को कई बार फटकार लगा चुकी हैं, लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभाव के आंकड़े भी आते रहे हैं, पर हालत जस की तस है। ऐसा लगता है कि फैसलों तथा नियमों और निर्देशों को लागू करने की जिम्मेदारी जिन पर है वे इस मामले में पर्याप्त गंभीर नहीं हैं।

गंगा सफाई योजना को शुरू हुए करीब तीस साल हो गए। इस पर अब तक अरबों रुपए बहाए जा चुके हैं। इस योजना के तहत शहरों और औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाले कचरे और गंदे पानी को नदियों में मिलने से पहले शोधित करने की इकाइयां लगाई जानी थीं। औद्योगिक इकाइयों पर नजर रखना और उनसे प्रदूषण मानकों का पालन कराना था। मगर राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी की वजह से नदियों को साफ-सुथरा बनाने का लक्ष्य अभी तक कागजी ही बना हुआ है। प्रदूषण नियंत्रण संबंधी मानकों की परवाह न करने में गैर-कानूनी तरीके से चलाई जाने वाली औद्योगिक इकाइयां सबसे आगे हैं। एनजीटी ने हरिद्वार से कानपुर के बीच की जिन एक हजार सत्तर इकाइयों की सूची वेबसाइट पर डालने का आदेश दिया है, उनमें से ज्यादातर बिना पंजीकरण के चल रही हैं। आश्चर्य है कि प्रदूषण को लगातार जीवन के लिए गंभीर समस्या के रूप में रेखांकित किया जा रहा है, मगर इस पर नजर रखने वाले महकमे बेधड़क प्रदूषण फैला रही औद्योगिक इकाइयों की तरफ पीठ किए बैठे हैं। दरअसल, ऐसे उद्योगों के मालिकान रसूख वाले लोग हैं और वे प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अमले को अपने प्रभाव में लेने की कोशिश करते हैं, उससे काम नहीं बना तो हेठी से भी बाज नहीं आते। नियम बना था कि जो औद्योगिक इकाइयां छोटी हैं, जिनके पास जलमल शोधन संयंत्र लगाने की जगह और क्षमता नहीं है, वे कई एक साथ मिल कर इस उपाय पर अमल कर सकती हैं। मगर उन्होंने इस दिशा में अभी तक पहल ही नहीं की है। उम्मीद की जानी चाहिए कि एनजीटी के ताजा आदेश से कार्रवाई का सिलसिला शुरू होगा।

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