नई मुसीबत

सरकारें गरीबों से कैसे-कैसे लंबे-चौड़े हवाई वादे करती रहती हैं और जब उन्हें पूरा करने का वक्त आता है तो कैसे उनसे पल्ला झाड़ लेती हैं, इसकी ताजा मिसाल दिल्ली सरकार है।

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अरविंद केजरीवाल । फाइल फोटो।

सरकारें गरीबों से कैसे-कैसे लंबे-चौड़े हवाई वादे करती रहती हैं और जब उन्हें पूरा करने का वक्त आता है तो कैसे उनसे पल्ला झाड़ लेती हैं, इसकी ताजा मिसाल दिल्ली सरकार है। हैरानी की बात यह है जो सरकार डेढ़ साल पहले प्रवासी मजदूरों की सबसे बड़ी हमदर्द बन कर सामने आई थी और किराया मांगने वाले मकान मालिकों को चेताया था, आज वही अपनी बात से मुकर रही है। सरकार के इस रुख पर दिल्ली हाई कोर्ट का नाराज होना स्वाभाविक है। इसीलिए सोमवार को हाई कोर्ट ने दिल्ली सरकार से साफ पूछा कि किराए का भुगतान करने का आपका इरादा है भी या नहीं। गौरतलब है कि पिछले साल पहली लहर के दौरान देशभर से प्रवासी मजदूर अपने घरों को लौट रहे थे। दिल्ली से भी प्रवासी मजदूरों का पलायन जोर पकड़ चुका था। कारखानों, फैक्ट्रियों से लेकर तमाम कामधंधे बंद हो गए थे। लोगों के पास पैसा नहीं था। ऐसे में घर का भाड़ा चुकाने की समस्या खड़ी हो गई थी। यह हालत पूरे देश में एक जैसी थी।

हालात की गंभीरता को देखते हुए तब दिल्ली सरकार ने प्रवासी मजदूरों के लिए जो कदम उठाए थे, उनकी चारों ओर जम कर तारीफ हुई थी। कामगार दिल्ली छोड़ कर न जाएं, इसके लिए दिल्ली सरकार ने सभी मकान मालिकों से कहा था कि वे प्रवासी मजदूरों और छात्रों से कोई किराया न लें। अगर किराए के दबाव की वजह से किसी मजदूर परिवार को दिल्ली छोड़ने को मजबूर होना पड़ा तो ऐसे मकान मालिक के खिलाफ सरकार सख्त कार्रवाई करेगी। तब सरकार ने यह भी संकेत दिया था कि इन मजदूरों का बकाया किराया दिल्ली सरकार दे देगी।

मकान मालिक प्रवासी मजदूरों को घर खाली करने के लिए दबाव न डालें, इसके लिए दिल्ली सरकार ने बाकयदा कड़े नियम जारी किए थे और मजिस्ट्रेटों को प्रवासी मजदूरों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी दी थी। ऐसा इसलिए भी जरूरी था कि दिल्ली में दिहाड़ी मजदूरों की तादाद लाखों में है जो रोज कमाते और खाते हैं। इनके पास कोई जमा पूंजी भी नहीं होती। पूर्णबंदी में औरों के मुकाबले प्रवासी मजदूरों के सामने संकट कहीं ज्यादा बड़ा और गंभीर था। इसलिए तब दिल्ली के मुख्यमंत्री ने एलान किया था कि मकान का किराया देने में असमर्थ गरीब किराएदारों के किराए का भुगतान सरकार करेगी। लेकिन आज यह मामला अदालत में है और सरकार अब अलग रुख दिखा रही है।

दरअसल, इस मामले पर पांच दैनिक वेतनभोगियों और एक मकान मालिक ने अदालत का दरवाजा खटखटाया था। इस साल बाईस जुलाई को अदालत ने फैसला दिया था कि मुख्यमंत्री का वादा लागू किया जाना चाहिए। यानी अब दिल्ली सरकार उन मकान मालिकों को किराया अदा करे जिनके यहां रहने वाले प्रवासी मजदूर भुगतान नहीं कर पाए थे। पर दिल्ली सरकार ने अब इसमें नया पेंच खोज लिया। सरकार का कहना है कि उसने तो मकान मालिकों से किराया न लेने की ह्यअपीलह्ण भर की थी। जो हो, सरकार ने मामले को शब्दों में उलझा दिया है। याद किया जाना चाहिए कि ऐसी ही अपील प्रधानमंत्री ने भी सभी नियोक्ताओं से की थी कि कामगारों का वेतन न रोकें, न कटौती करें। पर क्या कोई माना? जिसने चाहा उसने पैसा काटा, लोगों को नौकरी से निकाला, पर किसी के खिलाफ कोई कार्रवाई हुई हो, एक उदाहरण देखने को नहीं मिलता। दिल्ली सरकार के मामले में अभी सुनवाई जारी है। पर इस घटनाक्रम से सभी सरकारों को यह सबक लेना चाहिए कि वादे वहीं करें जो पूरे कर सकें, हवाई बातें नहीं।

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