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नेताजी सुभाष चंद्र बोस से संबंधित फिलहाल गोपनीय फाइलों को सार्वजनिक करने की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की घोषणा स्वागत-योग्य है।

नेताजी सुभाष चंद्र बोस से संबंधित फिलहाल गोपनीय फाइलों को सार्वजनिक करने की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की घोषणा स्वागत-योग्य है। बुधवार को नेताजी के परिजनों से मुलाकात के बाद की गई प्रधानमंत्री की घोषणा के मुताबिक इन फाइलों को सार्वजनिक करने की प्रक्रिया अगले साल तेईस जनवरी यानी नेताजी जयंती के दिन से शुरू की जाएगी। इन्हें सार्वजनिक जानकारी के दायरे में लाने की मांग लंबे समय से जब-तब उठती रही है। नेताजी के परिजन तो यह हमेशा चाहते ही थे, अध्ययन-अनुसंधान से ताल्लुक रखने वाले लोग भी यही कहते थे कि ये फाइलें सार्वजनिक कर दी जाएं, ताकि नेताजी से संबंधित बहुत-से महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक तथ्यों पर से परदा हट सके।

पर यह चाहत नेताजी के परिजनों और अकादमिक दायरे तक सीमित नहीं थी। चूंकि सुभाष चंद्र बोस आजादी की लड़ाई के बड़े नेता थे और देश के जन-मानस में उनकी छवि एक महानायक की रही है, इसलिए यह मांग जन-आकांक्षा का रूप लेती गई। यह भी एक खास वजह रही होगी कि पिछले लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने इन फाइलों का खुलासा करने का वादा किया था। अलबत्ता केंद्र में सरकार बनने के बाद सवा साल तक उसने इस दिशा में कुछ नहीं किया। पिछले महीने ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल सरकार के पास रखी नेताजी से जुड़ी चौंसठ फाइलों को सार्वजनिक कर दिया। स्वाभाविक ही इससे भाजपा बचाव की मुद्रा में आ गई। हालांकि भाजपा के अनेक नेता तब भी वही दलील देते रहे, जो पिछली सरकारें देती रही थीं, कि गोपनीय फाइलों को सार्वजनिक करने से कुछ देशों के साथ भारत के संबंधों पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। लेकिन अब केंद्र का सुर बदल गया है। प्रधानमंत्री ने यह भी कहा है कि वे अन्य देशों से अनुरोध करेंगे कि वे नेताजी से जुड़ी फाइलें सार्वजनिक कर दें।

जब मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने राज्य सरकार के पास रखी फाइलें सार्वजनिक की थीं, तो उनके इस फैसले के पीछे पश्चिम बंगाल के आगामी विधानसभा चुनाव को एक अहम कारण माना गया था। क्या प्रधानमंत्री की घोषणा के पीछे भी चुनावी वजह है? जो हो, आजादी के इतने बरस बीत जाने के बाद अब इन फाइलों को गोपनीय रखने का कोई औचित्य नहीं है। वैश्विक परिदृश्य और अंतरराष्ट्रीय समीकरण भी बहुत-कुछ बदल चुके हैं। लिहाजा, कुछ अन्य देशों से हमारे संबंध प्रभावित होने की दलील या आशंका को दोहराते रहना ठीक नहीं। अनुमान है कि केंद्र के पास नेताजी से जुड़ी ऐसी एक सौ तीस फाइलें हैं जो फिलहाल गोपनीय हैं। इनके सार्वजनिक होने से क्या फर्क पड़ेगा?

सबसे बड़ी गुत्थी यह रही है कि नेताजी का निधन कैसे हुआ। उनकी मृत्यु 1945 में एक विमान दुर्घटना में होने की धारणा को बंगाल सरकार की फाइलें सही नहीं ठहरातीं। हो सकता है केंद्र के पास रखी फाइलें भी इस मामले में वही कहें जो बंगाल की फाइलों में दर्ज है। फिर नेताजी के 1945 की विमान दुर्घटना के शिकार होने की बात हमेशा के लिए विदा हो जाएगी। लेकिन अगर ऐसा हुआ तो यह निष्कर्ष पहली बार सामने नहीं आएगा। नेताजी से जुड़ी गुत्थियां सुलझाने के लिए जो तीन आयोग बने उनमें से कोलकाता हाइकोर्ट के निर्देश पर गठित मुखर्जी आयोग ने भी विमान हादसे में नेताजी की मौत होने की धारणा को नकारा था। केंद्र के पास रखी फाइलों के जरिए हम कुछ और भी जान पाएंगे या नहीं, यह तो वक्त ही बताएगा!

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