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संपादकीयः नेट की आजादी

भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण यानी ट्राई द्वारा इंटरनेट सेवाओं तक सबकी समान पहुंच सुनिश्चित करने के लिए नेट-निरपेक्षता के पक्ष में लिए गए फैसले से इस विषय पर पिछले कुछ अरसे से जारी बहस का पटाक्षेप होने की उम्मीद है।

Author February 10, 2016 3:12 AM
अगर नागरिक मुहिम न होती, तो नेट निरपेक्षता पर ट्राई की ओर से पेश किए गए परामर्श-पत्र का नतीजा भिन्न भी हो सकता था।

भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण यानी ट्राई द्वारा इंटरनेट सेवाओं तक सबकी समान पहुंच सुनिश्चित करने के लिए नेट-निरपेक्षता के पक्ष में लिए गए फैसले से इस विषय पर पिछले कुछ अरसे से जारी बहस का पटाक्षेप होने की उम्मीद है। ट्राई के अनुसार इंटरनेट सेवा प्रदाता कंपनियां अब किन्हीं विशेष वेबसाइट्स, एप या सेवाओं के लिए अलग-अलग शुल्क नहीं वसूल सकतीं। न तो वे ऐसी भेदभावकारी पेशकश कर सकती हैं और न ग्राहकों से सेवाओं के लिए असमान दर से शुल्क वसूल सकती हैं। इस आदेश का उल्लंघन करने पर रोजाना पचास हजार रुपए जुर्माने का भी प्रावधान किया गया है।

दरअसल, अब यह किसी से छिपा नहीं रह गया है कि तमाम दूरसंचार कंपनियां बढ़ती गैर-पेशेवर मुनाफाखोरी से प्रेरित होकर इंटरनेट सेवाओं के अलग-अलग शुल्क निर्धारित करके उन तक सबकी समान पहुंच को बाधित करने की कोशिश करती रही हैं। ऐसी कोशिशों में सोशल मीडिया वेबसाइट फेसबुक की ‘फ्री बेसिक्स’ और एअरटेल की जीरो रेटिंग योजनाएं प्रमुख रही हैं जिन पर ट्राई के फैसले से पानी फिर गया है। गौरतलब है कि फेसबुक की स्कीम के तहत रिलायंस कम्युनिकेशंस के नेटवर्क पर ग्राहकों को फेसबुक सहित कुछ अन्य वेब सेवाएं मुफ्त देने की पेशकश की गई थी।

एअरटेल ने तो 2014 में इंटरनेट के जरिए फोन कॉल करने पर अलग से शुल्क वसूलने का फैसला किया था जिसे भारी विरोध के चलते टाल दिया गया। इसी तरह कुछ अन्य कंपनियों ने वाट्सएप, ट्विटर, वाइबर आदि के लिए अलग से शुल्क लेने की तैयारी शुरू कर दी है। ऐसी सभी योजनाएं किसी सेवा के लिए शुल्क वसूली में समानता और पारदर्शिता बरतने के दो बुनियादी तकाजों के सर्वथा विपरीत हैं। दूरसंचार कंपनियों की इस मनमानी के मद््देनजर नेट-निरपेक्षता की बाबत ट्राई ने लोगों का मत जानना चाहा तो उसके समक्ष रिकार्ड चौबीस लाख लोगों ने अपनी राय विभिन्न माध्यमों से रखी थी। इससे इंटरनेट की आजादी के प्रति व्यापक जनसमर्थन का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है।

दरअसल, इंटरनेट आधुनिक युग की सर्वाधिक उपयोगी सेवाओं में शुमार हो गया है। दुनिया का कोई कोना, कोई विषय, कोई क्षेत्र उसकी पहुंच से बाहर नहीं है। इंटरनेट पर दिनोंदिन बढ़ती निर्भरता ने उसे अनिवार्य आवश्यकता बना डाला है। इसके चलते वह सर्वसुलभ तो गया है लेकिन समान दरों पर सभी तक उसकी पहुंच के लिए दुनिया भर में वातावरण बनाया जा रहा है। यह अफसोसनाक है कि जब दुनिया एक विश्वग्राम में तब्दील हो चुकी है तब इंटनेट सेवा देने वाली कंपनियां अपने मुनाफे के अलग टापू खड़े करने पर तुली हैं। फेसबुक ने करोड़ों रुपए खर्च करके भारी-भरकम प्रचार अभियान चलाते हुए ‘फ्री बेसिक्स’ योजना के पक्ष में देवदूताना तर्क दिया था कि इसके माध्यम से गरीब लोग भी इंटरनेट इस्तमाल कर सकेंगे।

यहां यह बात सुविधापूर्वक भुला दी गई कि गरीब इस योजना के तहत मुफ्त में केवल फेसबुक और उसकी सहायक वेबसाइटों में ही उलझे रहेंगे, अन्य नेट सेवाओं और वेबसाइटों के लिए उन्हें मोटी राशि का भुगतान करना पड़ेगा। यह बाजार की स्वस्थ प्रस्पिर्स्धा के विरुद्ध और कुछ वैसा ही है जैसे ‘मुफ्त’ का लालच देकर ग्राहकों को अपनी ओर खींच कर उन्हें महंगे सामान की तरफ आकर्षित किया जाए। इंटननेट पर सबका समान हक माना गया है और दूरसंचार कंपनियां भी इस बात को सुभाषित की तरह रटती रहती हैं। लेकिन दूसरी तरफ इस हक को बाधित करने के हथकंडों से भी वे बाज नहीं आना चाहतीं। आखिर इंटरनेटीय जनतंत्र के तकाजों को वे कब समझेंगी?

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