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संपादकीयः नेपाल के साथ

भारत के नेपाल से जैसे रिश्ते रहे हैं उसकी तुलना किसी और द्विपक्षीय संबंध से नहीं की जा सकती। नेपाल हमारा पड़ोसी तो है ही, दोनों देशों की सीमाएं भी आपस में खुली हुई हैं।

Author May 14, 2018 3:57 AM
मोदी ने ओली को भरोसा दिलाया है कि भारत की ‘पड़ोसी प्रथम’ की नीति में नेपाल का स्थान प्रथम होगा।

भारत के नेपाल से जैसे रिश्ते रहे हैं उसकी तुलना किसी और द्विपक्षीय संबंध से नहीं की जा सकती। नेपाल हमारा पड़ोसी तो है ही, दोनों देशों की सीमाएं भी आपस में खुली हुई हैं। भारत ने नेपाल के लोगों को अपने यहां पढ़ाई और रोजगार करने आदि की सुविधा दे रखी है। भूगोल के अलावा इतिहास, पुराण, धर्म, भाषा, संस्कृति के तमाम तार दोनों देशों को जोड़ते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले हफ्ते नेपाल से भारत के रिश्ते की इसी विशिष्टता को उभारने की कोशिश की। प्रधानमंत्री का पद संभालने के बाद नेपाल की यह उनकी तीसरी यात्रा थी। हो सकता है अगले महीने मोदी फिर नेपाल जाएं, क्योंकि बिम्सटेक की शिखर बैठक होनी है।

नेपाल की अपनी पहली यात्रा में उन्होंने पशुपतिनाथ मंदिर में पूजा-अर्चना की थी, इस बार जानकी मंदिर में की। इस मौके पर उन्होंने जनकपुर और आसपास के क्षेत्रों के विकास के लिए सौ करोड़ रु. का अनुदान देने की घोषणा की और नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के साथ मिलकर जनकपुर से अयोध्या के लिए सीधी बस सेवा को हरी झंडी दिखाई। इसी के साथ मोदी ने जनकपुर को पर्यटन के रामायण सर्किट से जोड़ने की घोषणा की, और यह भी बताया कि इसी प्रकार दोनों देशों के बौद्ध और जैन तीर्थ स्थलों के बीच आवाजाही की सुविधाएं शुरू करके पर्यटन के अन्य सर्किट भी विकसित किए जाएंगे।

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इस तरह मोदी ने अबकी बार के नेपाल दौरे को धार्मिक-सांस्कृतिक रंग देने में कोई कसर बाकी नहीं रखी। इसमें सियासी वजह ढूंढ़ी जा सकती है। पर एक कारण और हो सकता है। इधर चीन ने निवेश और अनेक बड़ी परियोजनाओं में वित्तीय मदद के बल पर नेपाल में अपनी पैठ बढ़ाई है। इस मामले में चीन से बराबरी की होड़ ने सिर्फ खटास पैदा की है। लिहाजा, शायद भारत सरकार को लगा होगा कि उस होड़ में पड़ने के बजाय पड़ोसी देशों से पुरानी नजदीकियों को रेखांकित करना बेहतर होगा। फिर, नेपाल के साथ तो हमेशा ही नजदीकी रही है। पर पिछले तीन साल में कम से कम दो ऐसे बड़े मौके रहे जब नेपाल में भारत के प्रति रोष का माहौल बना। एक तो नया संविधान लागू होने के समय। नई बन रही राजनीतिक और विधायी व्यवस्था में मधेशियों तथा जनजातियों के प्रतिनिधित्व को लेकर भारत की चिंता के चलते नेपाल में ऐसा माहौल बना कि भारत सरकार नाहक दखलंदाजी कर रही है। सितंबर 2015 में हुई नाकेबंदी भी तनाव का सबब बनी। अगर वह सब खटास खत्म हो जाए, तो मोदी के इस बार के नेपाल दौरे की इससे बड़ी सार्थकता और क्या होगी!

मोदी ने ओली को भरोसा दिलाया है कि भारत की ‘पड़ोसी प्रथम’ की नीति में नेपाल का स्थान प्रथम होगा। इसी के साथ उन्होंने नेपाल की सबसे बड़ी जलविद्युत परियोजना का शिलान्यास किया। नेपाल की यह शिकायत रही है कि भारत की मदद से शुरू हुई परियोजनाएं लंबे समय से लंबित हैं। यह असंतोष वाजिब है और इसे दूर किया जाना चाहिए। हाल में मोदी चीन गए थे। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ उनकी शिखर वार्ता से एशिया की इन दो बड़ी ताकतों के आपसी रिश्तों में सुधार आने के संकेत मिले हैं। अगर चीन से संबंध सुधार की कोशिश आगे बढ़ती है तो नेपाल के अलावा म्यांमा, श्रीलंका, बांग्लादेश आदि से आपसी भरोसा बढ़ाने में भारत को सहूलियत होगी, क्योंकि तब शायद चीन कोई रणनीतिक अड़ंगा नहीं डालेगा।

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