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मधेसी समुदाय की मांगों के मद्देनजर नेपाल सरकार का संविधान में संशोधन के लिए राजी होना देर से ही सही, दुरुस्त कदम कहा जाएगा..

Author नई दिल्ली | Published on: December 23, 2015 2:33 AM
(फोटो-एपी/पीटीआई)

मधेसी समुदाय की मांगों के मद्देनजर नेपाल सरकार का संविधान में संशोधन के लिए राजी होना देर से ही सही, दुरुस्त कदम कहा जाएगा। इससे चार महीनों से चले आ रहे गतिरोध के दूर होने का रास्ता साफ हुआ है। नेपाल के मंत्रिमंडल की आपात बैठक में लिये गए फैसले के मुताबिक आनुपातिक प्रतिनिधित्व और आबादी के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन के लिए संविधान में संशोधन किया जाएगा। दरअसल, मंत्रिमंडल की आपात बैठक से पहले ही इसकी पहल हो चुकी थी, जो कि प्रस्तावित संशोधन की बाबत संसद में पेश किए जा चुके विधेयक से जाहिर है। इसका बहुत कुछ श्रेय मुख्य विपक्षी पार्टी नेपाली कांग्रेस को जाता है, जिसकी मधेसियों के बीच भी साख रही है।

चार महीने पहले जब नया संविधान लागू करने की घोषणा हुई, तभी से नेपाल का तराई क्षेत्र आंदोलित रहा है। मधेसियों के विरोध-प्रदर्शनों और नाकेबंदी के चलते एक विकट स्थिति पैदा हुई। नेपाल को भारत से र्इंधन समेत जरूरी वस्तुओं तथा दवाओं की आपूर्ति रुक गई। विरोध-प्रदर्शनों को कुचलने के लिए नेपाली पुलिस ने बड़ी निर्ममता से बल प्रयोग किया। इसके फलस्वरूप करीब पचास लोग मारे गए। इस बीच भारत-नेपाल रिश्तों में भी तनाव पैदा हुआ। नेपाली नेताओं ने रह-रह कर आरोप जड़ा कि नाकेबंदी के पीछे भारत का हाथ है, वह मधेसी लोगों को उकसा रहा है। जबकि भारत यह दोहराता रहा कि मधेसियों का असंतोष नए संविधान की देन और नेपाल का आंतरिक मामला है; नेपाल के राजनीतिक नेतृत्व को इस मसले को बातचीत से सुलझाना चाहिए। आखिर संविधान संशोधन की कवायद से भारत के इस रुख की पुष्टि हुई है। नेपाली मंत्रिमंडल के निर्णय का स्वागत करते हुए विदेशमंत्री सुषमा स्वराज ने उम्मीद जताई है कि प्रस्तावित संशोधन से गतिरोध दूर हो सकेगा।

भारत और नेपाल पड़ोसी तो हैं ही, दोनों के आपसी संबंध बहुत विशिष्ट रहे हैं। दोनों देशों की आपसी सीमाएं खुली हुई हैं। भारत ने अपने यहां नेपाल के लोगों को रहने, शिक्षा ग्रहण करने और काम करने की इजाजत दे रखी है। दोनों के बीच इतिहास और सभ्यता तथा संस्कृति से लेकर इतना कुछ साझा है कि किसी अन्य देश से तुलना नहीं की जा सकती। पिछले दिनों नेपाल से तनातनी पैदा हुई, और शिकायतें संयुक्त राष्ट्र तक पहुंचीं, तो दोनों के आपसी रिश्तों का यह अब तक का सबसे दुखद प्रकरण था। इस बीच चीन की तरफ नेपाल का झुकाव भी भारत के लिए बहुत खटकने वाला प्रसंग रहा। पर इस स्थिति से उबरने की जरूरत भी दोनों तरफ महसूस होती रही।

मधेसियों और नेपाल सरकार के बीच चले आ रहे गतिरोध को दूर करने की भूमिका तभी बन गई थी जब हाल में नेपाल के उपप्रधानमंत्री तथा विदेशमंत्री कमल थापा दो बार दिल्ली आए और भारतीय नेताओं से मुलाकात की। मधेसियों को यह अंदेशा रहा है कि नए संविधान में प्रांतों और निर्वाचन क्षेत्रों का जो स्वरूप सोचा गया है उससे विधायिका में उनका प्रतिनिधित्व उनकी आबादी के अनुपात में बहुत कम रह जाएगा। इसलिए विरोध में सारे मधेसी दल और संगठन एकजुट हो गए। संविधान संशोधन के लिए सरकार के राजी होने पर उनकी स्पष्ट प्रतिक्रिया फिलहाल नहीं आई है। इसका बड़ा कारण वह अविश्वास होगा जो कुछ महीनों में सत्तारूढ़ गठबंधन और मधेसियों के पैदा हुआ और बढ़ता गया। लेकिन उम्मीद की जानी चाहिए कि अब नाकेबंदी का दौर समाप्त हो जाएगा, भारत और नेपाल के रिश्तों में आई खटास दूर होगी तथा नए संविधान को लेकर मधेसियों की शिकायतों के निवारण की पहल अपनी तार्किक परिणति पर पहुंचेगी।

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