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संपादकीयः पाबंदी का परदा

दिलचस्प यह है कि भारतीय समाचार चैनलों पर रोक का यह कदम वहां मल्टी सिस्टम ऑपरेटर की ओर से उठाया गया है। इस संबंध में नेपाल सरकार ने भारतीय समाचार चैनलों का प्रसारण रोके जाने की कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की है।

Author Published on: July 11, 2020 1:25 AM
भारतीय समाचार चैनलों पर रोक का यह कदम वहां मल्टी सिस्टम ऑपरेटर की ओर से उठाया गया है।

पिछले कुछ समय से नेपाल ने भारत के प्रति जो रुख अख्तियार किया हुआ है, वह हैरान करने वाला है। हाल में सीमा विवाद के मसले पर जो तनातनी चल रही थी, उसे हल करने और संबंधों को सहज बनाने की जरूरत थी। इसके उलट नेपाल की ओर से जैसी प्रतिक्रिया आ रही है, वह निराशाजनक है। ताजा खबर यह है कि नेपाल में दूरदर्शन को छोड़ कर सभी भारतीय खबरिया टीवी चैनलों का प्रसारण बंद कर दिया गया है। यह आरोप लगाया गया है कि जिन चैनलों का प्रसारण रोका गया है, वे सभी नेपाल के खिलाफ बेमानी प्रचार कर रहे थे और उससे देश की राष्ट्रीय भावनाएं आहत हो रही थीं। अव्वल तो आमतौर पर भारतीय चैनल नेपाल की ओर से खड़े किए गए विवाद के संदर्भ में कुछ तथ्यों और विश्लेषणों को ही सामने रख रहे होंगे, लेकिन हो सकता है कि उन्हें नेपाल अपने लिए नकारात्मक मानता हो। ऐसी स्थिति में अगर नेपाल को ऐसी प्रस्तुतियों से दिक्कत थी या उसमें उसे कुछ गलत लग रहा था, तो वह आधिकारिक रूप से भारत के सामने आपत्ति जता सकता था। लेकिन बिना किसी औपचारिक शिकायत के सभी चैनलों का प्रसारण बंद कर देने के पीछे गंभीरता की कमी दिखती है।

दिलचस्प यह है कि भारतीय समाचार चैनलों पर रोक का यह कदम वहां मल्टी सिस्टम ऑपरेटर की ओर से उठाया गया है। इस संबंध में नेपाल सरकार ने भारतीय समाचार चैनलों का प्रसारण रोके जाने की कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की है। लेकिन नेपाल सरकार के कुछ मंत्रियों और सत्ताधारी नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी की ओर से जिस तरह भारतीय चैनलों के कथित ‘निराधार प्रचार’ पर आपत्ति जाहिर की जा रही थी, उससे साफ है कि पाबंदी के इस फैसले में सरकार की भी सहमति है। सवाल है कि एक देश की सरकार को दूसरे देश के बारे में कोई नीतिगत फैसला करते हुए क्या आवश्यक गंभीरता और जरूरी औपचारिकता का खयाल नहीं रखना चाहिए? अगर भारत सरकार से विधिवत इस बात की शिकायत की जाती और उसके बावजूद संतोषजनक उत्तर नहीं मिलता तब नेपाल इस तरह के मनमाने फैसले को अपने स्तर पर सही ठहरा सकता था। लेकिन एक संप्रभु देश से यह अपेक्षा की जाती है कि वह अपनी गरिमा बनाए रखने के लिए पड़ोसी संप्रभु देशों की गरिमा का भी खयाल रखे।

दरअसल, नेपाल का यह रवैया भारत के साथ अब तक के उन पारंपरिक संबंधों और उसमें गाढ़ेपन के उलट है, जिसके तहत दोनों देशों के बीच केवल सीमा का ही औपचारिक विभाजन देखा जाता रहा है। सांस्कृतिक स्तर पर दोनों देशों के बीच सहज संबंध रहे हैं और भौगोलिक अवस्थिति की वजह से नेपाल कई मामलों में भारत पर निर्भर भी रहा है। लेकिन हाल के वर्षों में जब से वहां चीन का दखल बढ़ा है, उसके बाद नेपाल के रुख में तेजी से बदलाव आया है। भारत की ओर से बिना किसी उकसावे के नेपाल ने जिस तरह के कदम उठाए हैं, वे आपसी रिश्तों में सुधार की ओर जाते नहीं दिख रहे। बल्कि हाल में देश के नक्शे को लेकर नेपाल की जिस तरह की हरकत सामने आई, वह सीधे-सीधे भारत के संप्रभु क्षेत्र में अनावश्यक दखल की कोशिश है और इसके बाद संबंधों में सहजता की उम्मीद कम हो जाती है। इसके बावजूद भारत ने अपनी ओर से ऐसी कोई असंयमित प्रतिक्रिया नहीं दी है, जिससे स्थिति और बिगड़े। लेकिन यह समझना मुश्किल है कि नेपाल आखिर किन वजहों से एक अघोषित जिद के तहत ऐसे कदम उठा रहा है, जिससे दोनों देशों के बीच दूरी बढ़ने के ही आसार नजर आ रहे हैं।

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