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संपादकीय: मौत के अस्पताल

राजकोट के उदय शिवानंद अस्पताल को सितंबर महीने में ही कोविड सेंटर के रूप में मंजूरी मिली थी। अस्पताल में फिलहाल कोरोना के तैंतीस मरीजों का इलाज चल रहा था, जहां आइसीयू वार्ड में अचानक आग लग गई। किसी तरह कई मरीजों को बचाया गया, लेकिन पांच लोगों की मौत हो गई।

Author Updated: November 28, 2020 5:24 AM
Rjakot, covidगुजरात के राजकोट में कोविड हास्टिपटल में आग लगने के बाद घायलों को सुरक्षित स्थान पर ले जाते कर्मचारी।

गुजरात में राजकोट के उदय शिवानंद अस्पताल में आग लगने से पांच मरीजों की मौत ने एक बार फिर लापरवाही के सिलसिले को ही उजागर किया है। हैरानी की बात यह है कि इस तरह की घटनाएं पहले भी सामने आईं और बेहद त्रासद नतीजों के साथ कई लोगों की जान चली गई। तब अफसोस और दुख के बावजूद हर बार लोगों को यह लगा था कि कम से कम आगे ध्यान रखा जाएगा और आने वाले समय में ऐसे हादसे नहीं देखने पड़ेंगे। लेकिन ऐसा लगता है कि अस्पताल प्रबंधनों की नजर में हादसों से बचाव के इंतजाम कोई गैर-प्राथमिकता के काम हैं और उसके खतरे की गंभीरता की उन्हें कोई परवाह नहीं है।

गौरतलब है कि राजकोट के उदय शिवानंद अस्पताल को सितंबर महीने में ही कोविड सेंटर के रूप में मंजूरी मिली थी। अस्पताल में फिलहाल कोरोना के तैंतीस मरीजों का इलाज चल रहा था, जहां आइसीयू वार्ड में अचानक आग लग गई। किसी तरह कई मरीजों को बचाया गया, लेकिन पांच लोग आग और धुएं की चपेट में आ गए और उनकी जान चली गई। फिलहाल शॉर्ट सर्किट को वजह बताया गया है। इमारतों में आग लगने की ज्यादातर घटनाओं में इसी को प्रमुख वजह बताया जाता है।

सवाल है कि आग लगने के लिए शॉर्ट सर्किट अगर कारण है भी तो यह कोई चमत्कार नहीं है कि अपने आप हो जाता है। यह निश्चित रूप से बिजली के प्रबंधन से जुड़ी खामी है, रखरखाव में लापरवाही का मामला है। अगर समय-समय पर बिजली के तारों या समूचे कनेक्शन के सही होने और ठीक से काम करने की जांच होती रहे तो उसमें खराबी की वजह से कोई हादसा होने की आशंका को कम या खत्म किया जा सकता है। इसके अलावा, आग से सुरक्षा के इंतजाम के पुख्ता होने की जांच और निगरानी हादसों से बचा सकता है। लेकिन अस्पतालों के प्रबंधनों को यह समझना जरूरी नहीं लगता कि किसी मामूली लापरवाही या चूक के नतीजे में कोई बड़ा हादसा हो सकता है और नाहक ही लोगों की जान जा सकती है।

अफसोसनाक यह है कि अकेले गुजरात में ही इससे पहले पिछले सिर्फ तीन महीनों के दौरान चार अस्पतालों और खासतौर पर कोविड सेंटरों में आग लगने की कई घटनाएं सामने आ चुकी हैं, जिनमें कई लोग मारे गए। जबकि मौजूदा दौर में आम लोगों के बीच यह उम्मीद होती है कि अस्पतालों के प्रबंधन और वहां की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर कोई समझौता नहीं किया जा रहा होगा, क्योंकि इस तरह के सारे अस्पताल एक तरह से बेहद संवेदनशील जगह के रूप में काम कर रहे हैं।

बहरहाल, राजकोट के अस्पताल में हुए ताजा हादसे की जांच के आदेश दे दिए गए हैं। अमूमन हर ऐसी घटना के बाद जांच के आदेश जारी होते हैं, लेकिन उसके बाद उसकी रिपोर्ट पर क्या कार्रवाई होती है, भविष्य में बचाव के इंतजामों के लिए क्या उपाय किए जाते हैं, यह कभी पता नहीं चल पाता। किसी एक हादसे का सबक यह होना चाहिए कि भविष्य में ऐसी घटनाएं न हों, इसके लिए हर स्तर पर सावधानी बरती जाए और उससे भी ज्यादा जरूरी यह है कि ऐसे हादसों के होने की आशंकाओं को खत्म किया जाए। लेकिन ऐसा लगता है कि बार-बार अस्पतालों में होने वाले हादसों के बावजूद बाकी जगहों पर उसके बारे में सोचना या सावधानी बरतना एक गैरजरूरी काम समझा जा रहा है।

नतीजतन, जो मरीज अस्पताल में स्वस्थ होने या अपनी जान बचाने की भूख में जाते हैं और आगे बेहतर जीवन जी सकते हैं, उनमें से कई महज अस्पताल प्रबंधन की लापरवाही की वजह से मौत के मुंह में चले जाते हैं।

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