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संपादकीय: भ्रष्टाचार का पुल

जिस कंपनी या समूह को पुल बनाने का ठेका दिया जाता है, उसके काम और सामग्रियों का निरीक्षण करने से लेकर उसकी गुणवत्ता सुनिश्चित कराने की जिम्मेदारी आखिर किसकी है। किसी भी स्तर पर हुई मिलीभगत से हुई लापरवाही और भ्रष्टाचार के नतीजे में पुल के ढहने के बाद सरकार को कठघरे में खड़ा होना पड़ता है। लेकिन सरकारें यह सुनिश्चित क्यों नहीं करतीं कि उसके अधीनस्थ महकमे अपने कामकाज में पारदर्शिता, ईमानदारी और गुणवत्ता को लेकर कोई चूक नहीं करें!

मध्य प्रदेश के सिवनी जिला मुख्यालय से करीब 60 किलोमीटर दूर वैनगंगा नदी पर बना एक पुल रविवार को बाढ़ में बह गया।

मध्यप्रदेश के सिवनी जिले में एक पुल के नदी में बह जाने की घटना ने एक बार फिर निर्माण कार्यों में योजनाओं को तैयार करने और उस पर अमल में बहुस्तरीय कमियों और व्याप्त भ्रष्टाचार को सतह पर ला दिया है। यह पुल अभी हाल में ही बन कर पूरा हुआ था और कुछ दिनों बाद इसका उद्घाटन होने वाला था। लेकिन सिवनी जिले के सुनवारा गांव में वैनगंगा नदी पर बना डेढ़ सौ मीटर का पुल बाढ़ के पहले बहाव को भी नहीं झेल पाया और पूरी तरह ध्वस्त होकर गिर गया। गनीमत यह थी कि जिस वक्त यह पुल ढहा, उसके ऊपर से पानी बह रहा था और इस वजह से यातायात बंद था और किसी की जान नहीं गई।

बनने के सिर्फ दो महीने के भीतर इसका ढह जाना पुलों के निर्माण कार्यों के दौरान बरती जाने वाली अनियमितता की कलई खोल देता है। सवाल है कि पुल के निर्माण से पहले क्या इस बात का आकलन नहीं किया गया था कि अगर भारी बारिश हुई तो वैनगंगा नदी के पानी के अलावा उसमें भीमगढ़ डैम से अगर पानी छोड़ा जाएगा तो नदी में उफान और बहाव की गति का स्तर क्या होगा और उसके मुताबिक पुल की मजबूती का आकलन कैसे किया जाना चाहिए?

आमतौर पर किसी भी पुल के निर्माण के क्रम में इस तरह के सारे पहलुओं को केंद्र में रखा जाता है। लेकिन यह समझना मुश्किल है कि इस पुल को कैसे बनाया गया था कि नदी के बहाव का पहला झटका भी यह नहीं झेल सका! जाहिर है, इसके निर्माण के क्रम में आकलन में लापरवाही से लेकर निर्माण कार्यों में इस्तेमाल की गई सामग्री के मामले में व्यापक भ्रष्टाचार बरता गया होगा।

नदी में बनने वाले पुल और उसके खंभों की गहराई और मजबूती कितनी होनी चाहिए, सामानों की गुणवत्ता और मात्रा क्या और कितनी हो जैसे पक्ष निर्माण कार्य के शुरू होने से पहले ही तय हो गए होंगे। लेकिन जिस स्थिति में पुल ढहा, उससे साफ है कि यह घटिया निर्माण सामग्रियों का नतीजा है। सरकार के लिए एक असुविधाजनक स्थिति यह पैदा हुई है कि इसका उद्घाटन कुछ ही दिन बाद होना था, तो अब इस पर उठने वाले सवालों को वह कैसे देखेगी! अब संभव है कि एक औपचारिकता के तहत फिर जांच कराने की घोषणा कर दी जाए। लेकिन कुछ समय बाद शायद फिर सब कुछ पहले की तरह चलता रहेगा।

ऐसा नहीं है कि नए बने पुल के ढह जाने की यह कोई अकेली घटना है। हाल ही में बरसात और बाढ़ के दौरान बिहार से भी पुलों के ढह जाने की ऐसी ही खबरें सामने आईं। ऐसी हर घटना के बाद सरकारों की ओर से जांच कराने का रटा-रटाया बयान आ जाता है, लेकिन उसका हासिल क्या होता है, यह जगजाहिर है। किसी भी पुल बनाने से लेकर दूसरे निर्माण कार्यों के लिए ठेका जारी करने से लेकर बाकी चरणों में किस तरह की प्रक्रिया अपनाई जाती है, यह भी किसी से छिपा नहीं है। इसका सीधा असर काम में लापरवाही और भ्रष्टाचार के रूप में देखा जाता है।

जिस कंपनी या समूह को पुल बनाने का ठेका दिया जाता है, उसके काम और सामग्रियों का निरीक्षण करने से लेकर उसकी गुणवत्ता सुनिश्चित कराने की जिम्मेदारी आखिर किसकी है। किसी भी स्तर पर हुई मिलीभगत से हुई लापरवाही और भ्रष्टाचार के नतीजे में पुल के ढहने के बाद सरकार को कठघरे में खड़ा होना पड़ता है। लेकिन सरकारें यह सुनिश्चित क्यों नहीं करतीं कि उसके अधीनस्थ महकमे अपने कामकाज में पारदर्शिता, ईमानदारी और गुणवत्ता को लेकर कोई चूक नहीं करें!

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