दिल्ली के जंतर-मंतर पर नीट परीक्षा में हुई गड़बड़ी के मुद्दे पर शुरू हुआ आंदोलन सोमवार को जिस रूप में पहुंच गया, उससे बचने के लिए अगर सिर्फ बातचीत का रास्ता अख्तियार किया गया होता, तो शायद यह नौबत नहीं आती। दरअसल, काकरोच जनता पार्टी ने सरकार से तीन मुख्य मांगों के साथ ‘चलो संसद’ का आह्वान किया था। वहां बड़ी संख्या में जमा हुए युवाओं को रोकने के लिए पुलिस और सुरक्षा बलों ने आंसू गैस के गोले दागे, बल प्रयोग किया, जिसमें कई युवाओं के घायल होने की खबर आई।
इस रुख ने एक बार फिर देश की लोकतांत्रिक परंपरा और सरकार की नीतियों पर सवाल उठाने के नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों पर चोट ही पहुंचाई है। संभव है कि इस तरह की सख्ती के जरिए आंदोलनकारियों की आवाज को फिलहाल शांत कर दिया जाए, लेकिन क्या इससे वे सवाल खत्म हो जाएंगे, जिन्हें लेकर युवाओं के सामने सड़क पर उतरने की नौबत आई? अगर सरकार की मंशा आंदोलनकारियों के मुद्दों को हंगामे के शोर में दफ्न करना नहीं है, तो क्या इसके लिए वक्त पर संवाद की पहल नहीं की जानी चाहिए थी?
इससे पहले शनिवार को इसी मुद्दे पर भूख हड़ताल कर रहे पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को जंतर-मंतर से पुलिस जिस तरीके से उठाकर ले गई थी, उस पर भी सवाल उठे थे। मगर उसके बाद भी सरकार ने अपनी ओर से आंदोलनकारी युवाओं की मांगों पर विचार करना या उन पर बातचीत करना जरूरी नहीं समझा।
‘चलो संसद’ के आह्वान के बाद एक तरह से पहले से ही सब कुछ बिल्कुल स्पष्ट था कि सोमवार को जंतर-मंतर पर होने वाला प्रदर्शन ज्यादा जटिल स्वरूप भी अख्तियार कर सकता है। सरकार ने उन्हें रोकने के लिए जिस शिद्दत से पुलिस बल को खुला छोड़ दिया, जो निर्देश दिए, क्या उतनी ही संजीदगी से आंदोलनकारी युवाओं से बातचीत के जरिए मसले का हल निकालने की कोशिश नहीं की जा सकती थी?
हालांकि हंगामे के बाद केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा से काकरोच जनता पार्टी के प्रतिनिधियों की मुलाकात हुई और उन्होंने अपनी मांगों से संबंधित एक पत्र उन्हें सौंपा, मगर यह समझना मुश्किल है कि आखिर सरकार ने किन वजहों से इस संदर्भ में शुरू से ही उदासीनता और उपेक्षा का रुख अपनाए रखा।
गौरतलब है कि आंदोलनकारियों की ओर से मुख्य रूप से तीन मांगें की जा रही हैं। इसमें सोनम वांगचुक को अस्पताल से छुट्टी देने और उन पर कोई कार्रवाई न करने, केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा या उन्हें बर्खास्त करने तथा नीट 2026 प्रश्नपत्र लीक होने के बाद आत्महत्या करने वाले विद्यार्थियों के परिजनों को एक-एक करोड़ रुपए मुआवजा देने की मांग शामिल है।
ये ऐसी मांगें हैं, जिन पर संवेदनशीलता और सकारात्मक दृष्टि के साथ विचार करना एक लोकतांत्रिक सरकार के लिए जिम्मेदारी का भी मामला होना चाहिए। विडंबना यह है कि जब शांतिपूर्ण आंदोलन का दायरा फैलने लगा और उसके सवाल तूल पकड़ने लगे, तब भी सरकार को इस समूचे मुद्दे पर परिपक्व प्रतिक्रिया देना जरूरी नहीं लगा।
लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन नागरिकों का संवैधानिक अधिकार है और आंदोलनकारियों की बात सुनना तथा उनसे संवाद करना सरकार का लोकतांत्रिक दायित्व है। इसके बजाय आंदोलनकारी युवाओं के खिलाफ सख्ती का रास्ता चुना गया। सरकार खुद शैक्षिक सुधार के दावे करती नहीं थकती, मगर विचित्र है कि शिक्षा में जवाबदेही का मुद्दा उसके लिए गैर-महत्त्वपूर्ण हो जाता है!
