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संपादकीय: फर्जी प्रतियोगी

पैसे लेकर प्रतियोगिताएं पास कराने वाले गिरोह अब इतने शातिर हो चुके हैं कि वे जटिल से जटिल घेरेबंदी को भी तोड़ कर उसमें पैठ बना लेते हैं। असम के जेईई केंद्र पर हुई धोखाधड़ी इसका ताजा उदाहरण है। आरोप है कि एक प्रतियोगी ने अपनी जगह दूसरे विद्यार्थी को बिठा कर परीक्षा दिलाई और 99.8 प्रतिशत अंक पाकर राज्य में सर्वोच्च आ गया।

Author Updated: October 30, 2020 12:43 AM
परीक्षा में शामिल होने से पहले जांच करातीं छाात्राएं। फाइल फोटो।

आइआइटी और देश के दूसरे प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग कॉलेजों में दाखिले के लिए आयोजित साझा प्रवेश परीक्षा यानी जेईई में असम से सर्वोच्च अंक लाने वाले विद्यार्थी की धोखाधड़ी के आरोप में गिरफ्तारी से एक बार फिर प्रतियोगी परीक्षाओं के आयोजन पर सवाल खड़े हो गए हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं में नकल कराने, परीक्षा से पहले ही प्रश्नपत्र बाहर निकाल लाने की तरकीबें अब पुरानी पड़ गई लगती हैं।

पैसे लेकर प्रतियोगिताएं पास कराने वाले गिरोह अब इतने शातिर हो चुके हैं कि वे जटिल से जटिल घेरेबंदी को भी तोड़ कर उसमें पैठ बना लेते हैं। असम के जेईई केंद्र पर हुई धोखाधड़ी इसका ताजा उदाहरण है। आरोप है कि एक प्रतियोगी ने अपनी जगह दूसरे विद्यार्थी को बिठा कर परीक्षा दिलाई और 99.8 प्रतिशत अंक पाकर राज्य में सर्वोच्च आ गया। इस मामले में पांच लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है और उनसे बातचीत के आधार पर अब सच्चाई काफी हद तक उजागर भी हो चुकी है।

इससे प्रतियोगी परीक्षाओं को और चाकचौबंद बनाने, नकल कराने वाले गिरोहों पर नकेल कसने के व्यावहारिक उपायों पर विचार करने की जरूरत फिर से रेखांकित हुई है।नकल की प्रवृत्ति पर रोक लगाने के मकसद से कंप्यूटरीकृत केंद्रों पर आॅनलाइन प्रतियोगी परीक्षाएं कराने का रास्ता निकाला गया था। माना गया कि इससे पर्चे की चोरी रुकेगी।

आॅनलाइन परीक्षा में केंद्रीय कक्ष से सभी परीक्षा केंद्रों पर एक साथ पर्चे जारी किए जाते हैं और परीक्षार्थी की तमाम गतिविधियों पर नजर रखी जाती है। प्रतियोगी परीक्षाएं आयोजित कराने के लिए राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी यानी एनटीए नामक एक विशेष एजेंसी गठित की गई है। उसने हर शहर में अलग-अलग एजेंसियों को कंप्यूटरीकृत परीक्षा केंद्र संचालित करने की जिम्मेदारी दे रखी है।

उन्हीं केंद्रों पर परीक्षार्थियों को बिठाया जाता है। इन केंद्रों पर वही परीक्षार्थी प्रवेश कर पाता है, जिसने फॉर्म भरा है, क्योंकि फॉर्म के साथ उसके बायोमीट्रिक साक्ष्य भी संलग्न होते हैं। मगर असम वाले परीक्षार्थी ने इन तमाम उपायों को धता बता डाला। पता चला है कि वह परीक्षा केंद्र पर खुद उपस्थित हुआ, अपनी बायोमीट्रिक जांच कराई और फिर बाहर निकल गया।

उसकी जगह दूसरा विद्यार्थी परीक्षा देने बैठा और सर्वाधिक अंक ले आया। जाहिर है, जो दूसरा व्यक्ति परीक्षा के लिए बिठाया गया, उसे इसके अच्छी-खासी रकम दी गई होगी। प्राथमिक बातचीत के आधार पर पता चला है कि किसी बिचौलिये ने यह काम कराया था। यानी नकल कराने वाले गिरोह ने इस घटना को अंजाम दिया।

असली की जगह नकली परीक्षार्थी कैसे परीक्षा केंद्र और फिर परीक्षा कक्ष के भीतर घुसा, इसे समझना मुश्किल नहीं है। स्पष्ट है कि जिसने पैसे लेकर यह परीक्षा पास कराने का भरोसा दिलाया, उसी ने परीक्षा केंद्र के कर्मचारियों को अपने पक्ष में कर लिया होगा। हालांकि पुलिस उस गिरोह और उसकी साजिश का पता लगाने में जुटी है, मगर जरूरत है कि इस प्रणाली को और विश्वसनीय बनाया जाए।

ऐसी घटनाएं न सिर्फ नकल कराने और गैर-कानून तरीके से शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश पाने वालों की प्रवृत्ति को बल देती हैं, बल्कि परीक्षाएं आयोजित कराने वाली एजेंसियों की साख पर भी चोट पहुंचाती हैं। इससे कई प्रतिभाशाली और वास्तव में प्रवेश के हकदार बच्चों का हक भी छिन जाता है। परीक्षा के लिए उपयोग में लाए जाने वाले कंप्यूटरों में कुछ और ऐसे उपकरण, सॉफ्टवेयर आदि का विकास करना होगा, जिनके जरिए परीक्षार्थी पर निरंतर निगरानी रखी जा सके और जरा भी धोखाधड़ी की कोशिश हो, तो उसे तुरंत पकड़ा जाए।

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